जवान बनाम किसान

अखिलेश अखिल
देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था-जय जवान, जय किसान का। इस नारे ने जन-मन को प्रभावित किया। गांधी जी ने भी देश की ताकत को किसानों और जवानों में देखा था। देश और देशवासियों की सुरक्षा का भार जवानों पर होता है, तो किसान हमारे अन्नदाता होते हैं। देश के 14वें प्रधानमंत्री नरेन्द्ग मोदी भी जवानों-किसानों की बात करते हैं। उन्होंने इस नारे में जय विज्ञान जोड़ा। यानी जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान।
सरकार की ढुलमुल नीति से सीमा पर जवान शहीद हो रहे हैं और किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हद तो तब हो गयी जब इसी 2 अक्टूबर को गांधी-शास्त्री की जयंती पर उत्तर प्रदेश और दिल्ली के बॉर्डर पर किसान और जवान आमने-सामने आ गये। किसानों पर वाटर कैनन, अश्रु गोले और लाठियां भांजी गईं। जवाब में किसानों ने पथराव किए। ये हालात क्यों जन्मे, इस बात का पोस्टमार्टम करती रिपोर्ट:
दिल्ली के जंतर-मंतर पर तेलंगाना के किसानों के हैरान करने देने वाले प्रदर्शन को थोड़ी देर के लिए छोड़ दिया जाए, तो देशवासियों ने पिछले डेढ़ साल में अन्नदाताओं के हुजूम को अपनी विकराल समस्याओं से निजात पाने के लिए भूखे-प्यासे रह कर तीन बार सड़कों पर उतरते देखा। सबसे पहले किसान मध्य प्रदेश में उतरे, तो उनके 6 किसान साथी मंदसौर जिले में 6 जून, 2०17 को पुलिस की गोलियों से भून दिये गये। इस साल 11 मार्च को महाराष्ट्र के नासिक से हजारों की तादाद में कई दिनों तक पैदल चल कर मुम्बई पहुंचे, तो उन्हें सिर्फ कोरा आश्वासन थमा दिया गया।
जब ये इस साल अहिंसा के पुजारी गांधी जी और जय जवान जय किसान नारे के जनक देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्ग मोदी के कानों तक अपनी मांगों को पहुंचाने के लिए उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से दिल्ली सीमा में प्रवेश के लिए पैर उठाये, तो इन पर दिल्ली पुलिस ने लाठियां बरसायीं, पानी की बौछारें कीं। इससे जी नहीं भरा, तो पुलिस वालों ने इन पर रबर की गोलियां चलाने के साथ हवाई फायरिंग कर इन्हें दहलाकर तितर-बितर कर दिया।
हालांकि उस दिन देर रात इन्हें किसान घाट जाने दिया गया, लेकिन इनके साथ जिस तरह से बर्बर पुलिसिया कार्रवाई करायी गयी, उससे साफ है कि चाहे केन्द्ग सरकार हो या भाजपा शासित राज्य सरकारें; चिलचिलाती गर्मी, कंपकंपा देने वाली ठंड, घनघोर बारिश या फिर सूखे के हालात तक में कड़ी मेहनत कर देशवासियों का पेट भरने वाले अन्नदाताओं को अपनी समस्याओं को उठाने पर सिर्फ जख्म ही मिलने वाला है।
तीसरी बार लगभग 7० हजार किसानों ने भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले अपनी विभिन्न मांगों को लेकर 23 सितम्बर को हरिद्बार से किसान क्रांति पदयात्रा का श्रीगणेश कर दिल्ली के लिए कूच किया था। इनकी मुख्य मांगों में स्वामीनाथन आयोग की सभी सिफारिशंे जल्द लागू करने, चीनी मिलों द्बारा बकाया गन्ने का भुगतान तुरंत करने और भुगतान में 14 दिन से अधिक देरी होने पर ब्याज देने, गन्ने का मूल्य 45० रुपये क्विंटल करने, 1० साल पुराने ट्रैक्टरों पर लगी रोक हटाने आदि मांगें शामिल थीं।
हालांकि किसानों के भारी मतों से सत्ता सुख भोगने वाली सरकारों की तरफ से पुलिस के जरिए ज्यादतियां होती रही हैं, लेकिन अहिंसा के पुजारी और जय जवान जय किसान के जनक देश के दूसरे प्रधानमंत्री शास्त्री जी के जन्मदिन पर इनके साथ पुलिसिया ज्यादती हुई, तो पूरे देश में केन्द्ग सरकार की निंदा होने लगी। केन्द्ग सरकार की निंदा इसलिए की गई, क्योंकि दिल्ली पुलिस केन्द् सरकार के ही अधीन है।
जय जवान जय किसान का नारा कोई मामूली नारा नहीं है। इसमें आजाद भारत की विरासत छिपी है, जिसमें एकता का भाव समाहित है। लेकिन मोदी सरकार के इशारे पर गांधी जी व शास्त्री जी के जन्मदिन पर किसानों के साथ जैसा बर्बर सलूक किया गया, पहले कभी नहीं हुआ। बेशक मोदी सरकार भी जय जवान जय किसान का नारा लगाती है, लेकिन इस घटना के आलोक में यह कहने में हर्ज नहीं कि वह गांधी जी व शास्त्री जी के आदर्शों पर कतई फिट बैठती नहीं दिखती।
किसानों के साथ ज्यादती किसी और दिन हुई होती, तो शायद देशवासी किसानों के साथ उसके दर्द को सह लेते। देशवासियों ने यह दर्द इस तौर पर भी महसूस किया कि दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर सरकार ने पुलिसिया कार्रवाई कराकर जवानों और किसानों के बीच मतभेद भी पैदा कर दिया। मतभेद इस मायने में कि शांतप्रिय आंदोलन करने वाले किसान पुलिस कार्रवाई से इतने आक्रोशित हुए कि उनकी तरफ से पुलिस वालों पर पथराव किया गया।
थोड़ी जानकारी जय जवान जय किसान की बाबत। शास्त्री जी ने जय जवान का नारा देशवासियों से सीमा पर लड़ रहे जवानों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए दिया था, ताकि अपने सैनिकों को देश के आम लोगों का नैतिक बल और समर्थन हासिल हो। जय किसान नारे के पीछे उनका मकसद था कि किसानों को अधिक से अधिक अन्न उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित करना था, ताकि खाद्यान्न संकट में फंसे भारत पर अमेरिका अपनी अप्रत्यक्ष गुलामी थोपने की कोशिश में कामयाब न हो सके।
दरअसल जब शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी, उस समय अपना देश विकट खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था। तब सभी भारतीय अमेरिका के पीएल-48० स्कीम के तहत मिलने वाले लाल गेहूं को खाने के लिए बाध्य थे। वर्ष 1965 में एक तरफ पाकिस्तान के साथ जंग, तो दूसरी तरफ भयानक सूखे ने इस संकट को और भी बढ़ा दिया था। ऐसे हालात में शास्त्री जी ने देश के लोगों से दो महत्वपूर्ण आह्वान किए थे। पहला, हर खाली जमीन पर अनाज और सब्जियां बोयी जाएं और दूसरा, हर कोई सप्ताह में एक दिन उपवास रखे। उनका यह आह्वान किसी विशेष जाति वर्ग या उम्र समूह के लिए नहीं था, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए था, जिसको ऐसा करने से शारीरिक नुकसान न हो। बहरहाल, किसानों और जवानों के प्रति शास्त्री जी ने जो आदर प्रकट किया था, उसका परिणाम यह रहा कि शास्त्री जी जहां देश के सबसे सम्मानित राजनेता बन गये, वहीं उनकी इसी नैतिकता के चलते भारत के लोगों ने जल्द ही खाद्यान्न संकट पर विजय भी प्राप्त कर ली।
कुछ बातें पुलिस की बर्बर कार्रवाई में जख्मी हुए किसानों की कि वे किस तरह अपने साथियों के पैरों और हाथों से बहते खून को दिखाते हुए कह रहे थे कि ये (नेता लोग) चुनाव के वक्त कर्ज माफी का वादा करते हैं, लेकिन बाद में भूल जाते हैं। किसानों के साथ मजाक बना रखा है। साढ़े चार साल हो गए कहीं कुछ नहीं किया। किसानों पर कर्ज सरकार की गलत नीतियों की वजह से है। झूठ बोल के वोट हासिल किए थे। अगले चुनाव में कतई स्वीकार नहीं करेंगे। ये हम पर गोलियां चलवा रहे हैं। अलग-अलग राज्यों से जुटे किसानों में महिलाएं भी शामिल थीं। यूपी बॉर्डर पर दिल्ली में प्रवेश करने का इंतजार करतीं ट्रैक्टरों में बैठीं ये महिलाएं अपनी-अपनी भाषा में लगभग एक ही बात कह रही थीं कि सरकार को कर्ज माफी, बिजली का बिल, गन्ने का भुगतान और किए वादों को पूरा करना होगा। किसान यूनियन के राकेश टिकैत कह रहे थे कि लाठी, पानी और आंसू गैस के गोले आंदोलन के प्रसाद हैं। किसी-किसी को नसीब होए है ये।
विपक्षी दलों में कांग्रेस की तरफ से कटाक्ष किया गया कि दिल्ली सल्तनत का बादशाह सत्ता के नशे में है, तो राजद सुप्रीमो लालू यादव ने कहा, जय जवान जय किसान का नारा देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर अच्छे दिनों की छलावा करने वाली सरकार ने उस नारे को मर जवान, मर किसान में तब्दील कर दिया। लालू यादव के बेटे तेजस्वी ने कहा कि पूंजीपतियों के दलालों, अन्नदाताओं की मांगें पूरी करो या सिंहासन खाली करो। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि यह भाजपा सरकार की निरंकुशता की पराकाष्ठा है, जिसका खामियाजा भुगतने के लिए उसे तैयार रहना चाहिए।
यह बात और है कि यह किसान क्रांति पदयात्रा खत्म हो चुकी है और किसान अपने घरों को लौट चुके हैं, लेकिन उनके मन में यह बात बैठ गयी है कि यह धोखेबाज सरकार है, जो शास्त्री जी के नारों का अपमान करती है और किसानों को देशद्रोही की तरह देखती है। बहरहाल, कृषि विषयक कुछ आंकड़ों पर नजर डालिये, तो पता चलता है कि पिछले 5० महीनों में मोदी सरकार कृषि और किसानों के लिए कुछ नहीं कर पायी। उल्टे तबाही की सूरत दिखती है। मसलन, 2०1०-11 से 2०13-14 के बीच कृषि क्षेत्र की विकास दर 5.2 प्रतिशत थी, जो मोदी सरकार के 4 वर्षों के शासन में गिरकर 2.5 प्रतिशत यानी आधी से भी कम हो गई है।
किसानों की वार्षिक वास्तविक आय में वृद्धि की दर 3.6 प्रतिशत से गिरकर 2.5 प्रतिशत हो गई है। अधिकांश मुख्य फसलों पर लाभ में 1 तिहाई की गिरावट आई है। कृषि निर्यात 2०13-14 के 42 बिलियन डॉलर से गिरकर 2०17-18 में 38 बिलियन डॉलर रह गया है। कृषि सम्बंधी आयात 2०13-14 के 16 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2०17-18 में 24 बिलियन डॉलर हो गया है।
जिस कृषि पर देश की करीब 63 प्रतिशत आबादी यानी 75 करोड़ से ऊपर लोग निर्भर हैं, उसे मोदी ने 5० महीनों में तबाही के कगार पर ला खड़ा किया है। ऐसे हालात में आगे चलकर किसानों की रणनीति क्या होगी, किसी को फिलहाल नहीं पता। फिर भी किसान अब यह कहने लगे हैं कि जब तक इस सरकार को सत्ता से बेदखल नहीं किया जाएगा जय जवान जय किसान का नारा सार्थक नहीं होगा।

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