…जब गांधी जी वेश्या के कोठे पर गए, तब किया था ये काम

नेशनल डेस्क ।। बापू जब किशोर थे, तब वो अजीबोगरीब कुंठाओं से घिरे रहते थे। कमजोर और दब्बू भी थे। उल्टी-सीधी हरकतें करते थे। अपनी हरकतों के बाद खुद को अपराधबोध से ग्रस्त भी पाते थे। किशोर उम्र में एक समय ऐसा था, जब उनकी सोहबत सही नहीं थी, जिसमें उन्होंने कई गलत काम भी किए।

गांधीजी को तब मोहनदास के रूप में जाना जाता था। उन्होंने अपनी आत्मकथा में इन कामों को स्वीकार किया। गांधी के जीवनी लेखकों ने भी इस पर लिखा। किशोर मोहनदास ने तब चोरी की, सिगरेट पी, आत्महत्या करने के बारे में सोचा। एक दिन वो वेश्या के कोठे पर भी पहुंच गए। पोरबंदर और राजकोट में वो दिन उनके लिए अजीब से ही थे।
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स्कूल के दिनों में मोहनदास की दोस्ती और जान-पहचान नहीं के बराबर थी। दब्बू होने के कारण वो किसी से बात नहीं कर पाते थे। परिवार में ही इतने हमउम्र थे कि उनका समय ज्यादातर उन्हीं के बीच गुजरता था। परिवार के बाहर पहली बार उनका जो दोस्त बना, उसका नाम शेख मेहताब था। उससे भी उनकी जान पहचान इसलिए हो पाई, क्योंकि वो उनके बड़े भाई कर्णवदास का मित्र था। शेख मेहताब निडर और साहसी था।
मोहनदास गांधी अपने इस मुसलमान मित्र की निडरता औऱ ताकत से प्रभावित थे। उसके जैसा बनना चाहते थे। किशोर गांधी ने अपने दोस्त के साथ मिलकर अजीबोगरीब काम किए, जिसने उन्हें ग्लानि से भर दिया मेहताब ने उन्हें बताया कि मांस खाने से वो अपनी ताकत बढ़ा सकते हैं।
गांधीजी का परिवार विशुद्ध शाकाहारी परिवार था। मांस खाने की बात तो दूर रही, उसके बारे में बात करना भी पाप था। लेकिन गांधीजी उसकी बातों से इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने मांस खाने की कोशिश की ताकि ताकत बढाई जा सके, लेकिन वो अपने इस प्रयोग में बुरी तरह विफल रहे।
फिर मेहताब ने मोहनदास पर दबाव डाला कि उन्हें अपना पुरुषत्व देखने के लिए वेश्यालय चलना चाहिए। उसने आश्वस्त किया कि इसमें कोई बुराई नहीं है। बल्कि इस प्रयोग के बाद वह खुद को गजब का पुरुष महसूस करने लगेंगे। समस्या ये हुई कि गांधीजी के पास पैसा नहीं था। पैसा मेहताब की जेब से निकला। दोनों साथ में कोठे पर पहुंचे। वहां मेहताब किसी वेश्या के साथ अलग कमरे में चला गया। किशोर गांधी को एक अन्य महिला के हवाले कर दिया।
मोहनदास कोठे में महिला के साथ कमरे में चले तो गए। उस एकांत ने उनके होश उड़ा दिए। वह एक कोने में सहमे बैठे रहे। एकाध बार जब उस महिला ने उन्हें हाथ लगाया तो वह थर-थर कांपने लगे। थोड़ी देर तक जब यही स्थिति बनी रही तो वो महिला ऊब गई। उसने धक्का देकर उन्हें कमरे से बाहर निकाल दिया।
मोहनदास यकीनन उस प्रयोग से सकुशल बच गए। लेकिन कोठे पर जाने के इस कदम ने उनके अपराध बोधों में एक और वृद्धि हो गई। अब उन्हें लगने लगा कि उन्होंने वेश्यालय जाकर अपने पुरुषत्व को चोट पहुंचाई है। चूंकि ये कदम उन्होंने कस्तूरबा से शादी के बाद उठाया था, लिहाजा वह ज्यादा ग्लानि से भी भर उठे थे। कस्तूरबा से हालांकि ये बात उन्होंने कभी नहीं बताई। लेकिन उन्हें लगने लगा कि मेहताब की बातों में आकर वो गलतियां कर रहे हैं। उन्होंने खुद को फिर उससे दूर कर लिया।
फोटो- फाइल

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