चलो फिर एक बार तनिक गांधीजी का सुस्मरण करे, साथ में लालजी का भी…!

लखनऊ :आज 2 अक्तूबर से लेकर आनेवाले 2 अक्तूबर तक पुरे देश में महात्मा गांधीजी के बारे में विचार विमर्श, वाद विवाद संवाद शुरू हो गया है। १८६९ में गुजरात के पोरबन्दर में जन्मे मोहनदास करमचन्द गाँधी नामक एक साधारण सा मानव कैसे महामानव और महात्मा गाँधी बना उसकी गाथाये फिर एक बार दोहराई जायेंगी। नेतागण गांधीजी के जीवन से प्रेरणा लेने की हिदायते देंगे। आम आदमी को सत्यवादी–अहिंसावादी बनने के लिए कहेंगे। सादगीपूर्ण जीवन बिताने के लिए बार बार दोहरायेंगे। लेकिन ये सब साधारण मानवी के लिए ही है ऐसा नेतागण मानते है। गाँधी विचारधारा नेतागण के लिए नहीं ऐसी एक सोच बन गई है। गाँधी उपदेश दूसरो को देने के लिए है। उसका आचरण खुद के लिए नहीं ऐसी मानसिकता कुछ नेताओ में पनपी है और पनप भी रही है।

भारत के शीर्ष नेतागण गांधीजी के बारे में भूरी भूरी प्रसंशा करते है। उन्हें सर्वगुणसंपन्न बताते है। सभी समस्याओं का समाधान गाँधी विचारधारा में है यह भी कहते है लेकिन उनके बताये रास्ते पे चलना किसी नेता को पसंद नहीं। गांधीजी ने भारत की गरीबी देख एक ही वस्त्र परिधान की ठान ली थी। आज के नेता? आधार कार्ड न होने से राशन नहीं मिलने से कोई भूख से मर जाय तो भी इन नेताओं को कोई असर नही होता। लोकतंत्र में राजा की तरह ठाटबाट से रहते आज के नेता और 2 अक्तूबर को सादगीपूर्ण जीवन जिने की सलाह देते है। ऐसे नेताओं पर जनता विश्वास करती है। क्यों की जनता करिश्माई और चकाचौंध से आंजी जाती है। उन्हें अंजाया जाता है और भोलीभाली जनता दो हाथ जोड़ कर उसे भगवान मान अपने पेट्रोल के बढ़ते दाम को भूल जाती है।
1947 के बाद जन्मे लोगो को और आज की नयी पीढ़ी को गाँधी विचारधारा के बारे में कितना मालुम है इसका सर्वे किया जाय तो पत्ता चले। गाँधीजी का मूल्य सिर्फ भारतकी मुद्रा करंसी नोट तक सिमित रह गया है। बाकी जो बचा था वह उनकी पहचान उनके गोल चश्मे सौचालय की दिवार पर टिक गए है स्वच्छता के नाम पर। गांधीजी को जितना कोसा जायेंगा, जितनी उनकी खिल्ली उड़ाई जायेंगी जितना उनका अवमान होंगा गांधीजी उतने ही चमकेंगे। चलो फिर एक बार गांधीजी के साथ भारत के अन्य एक महान सपूत लाल बहादुर शास्त्रीजी का भी स्मरण करे। वे भी आज ही के दिन जन्मे थे। लेकिन गाँधी उत्सव में लालजी को इतना याद नहीं किया जाता। ये वे महामानव थे जो कद में छोटे लेकिन सादगी और देश सेवा में बड़े थे। उन्होंने ही १९६५ में पाकिस्तान को युध्ध में हराया था। दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे। ऐसे दो महामानव के सामने आजके सभी नेता बौने नजर आते है। भारत के नेतागण जब तक इन दो नेताओं के बताए रास्ते पर आगे नहीं चलेंगे तब तक भारत आगे नहीं बढ़ सकता। उनका सही आचरण ही उनके जीवन का सन्देश है। मोहन-लालजी को शत शत नमन…..!

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