गर्भ में ऐसे शिशु बनते हैं किन्नर, बस ये 3 गलतिया करते ही आपके घर में भी जन्मेगा किन्नर

हमारे समाज की जब भी बात होती है तो अक्सर लोग महिला पुरुष की ही बात करते है लेकिन वहीँ इस दुनिया में भगवान ने स्त्री पुरुष के साथ एक और इन्सान बनाया था जिसे हम सब किन्नर कहते है. किन्नरों से जुडी तमाम बातें हमारे समाज में होती है. उसकी दुनिया एक अलग ही दुनिया होती है| समाज में वो ऐसा रहते है जैसे वो हो ही न |ये बात तो सभी जानते हैं कि किन्नर कभी मां-बाप नहीं बन सकते, लेकिन आपके मन में ये सवाल जरूर उठता होगा कि आखिर किन्नर पैदा कैसे हो जाते हैं।

हाल ही में वैज्ञानिकों ने इसके कारण का खुलासा किया है, जिसे जानना हर मां-बाप के लिए बहुत जरूरी है। ऐसी ही मुख्य वजह के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया है जिससे गर्भ में पल रहा बच किन्नर का रूप ले लेता है।एक मां असल में तो बच्चे को ही जन्म देती है, लेकिन बच्चा कुछ परिस्थितियों में आम न रहकर किन्नर का रूप ले लेता है। ऐसे में जिन्दगीभर ये बच्चा माता-पिता के पास न रहते हुए किन्नर को सौंप दिया जाता है।

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जानिए कैसे होता है लिंग निर्धारण

जीव विज्ञान के मुताबिक, महिलाओं और पुरुषों में दो तरह के यौन गुणसूत्र (सेक्स क्रोमोसोम) पाए जाते हैं। महिला के अंडाशय में XX क्रोमोसोम और पुरुष के शुक्राणु में XY क्रोमोसोम होता है। XX क्रोमोसोम लड़की और XY क्रोमोसोम लड़के का लिंग निर्धारित करते हैं। जब पुरुष के शुक्राणु का Y क्रोमोसोम महिला के अंडाशय के X क्रोमोसोम से निषेचित होता है, तो लड़का पैदा होता है। इसी तरह, अगर पुरुष के शुक्राणु का X क्रमोसोम महिला के अंडाशय के X क्रोमोसोम से निषेचित होता है, तो लड़की पैदा होती है  लेकिन XY और XX क्रोमोसोम के अलावा कभी-कभी ऐसी परिस्थिति आ जाती है जब  XXX, YY, OX क्रोमोसोमल डिसऑर्डर वाले बच्चें भी हो जाते हैं जो कि किन्नर पैदा होते हैं , और ऐसे बच्चो में स्त्री व पुरुष दोनों के ही गुण पाए जाते है |

धार्मिक दृष्टिकोण:-

आध्यात्म में इनके जन्म को लेकर कई ग्रह परिस्थितियां जिम्मेदार हैं, माना जाता है कि पिता के अंश की अधिकता से पुत्र और मान के अंश की अधिकता से पुत्री जन्म लेती है लेकिन कुछ कारणों की वजह से दोनों का अंश सामान रह जाये तो किन्नर जन्म लेते हैं और इसके लिए कुछ ग्रह-योग भी जिम्मेदार हैं।

डॉक्टरों का कहना है की गर्भावस्था के दौरान शुरुआती के तीन महीनो में शिशु का लिंग निर्धारण होने लगता है और इसीलिए इन तीन महीनो में माँ को काफी ज्यादा खास  ख्याल रखना होता है जिसमे की इस दौरान  गर्भवती महिला को  दौरान चोट लगने, टॉक्सिक खान-पान और हॉर्मोनल प्रॉब्लम जैसी चीजों से बचना चाहिए वरना ट्रांसजेंडर होने की सम्भावना बढ़ जाती है |

महिला शुरुआती तीन महीने में बुखार होने पर अधिक पावर कि दवा खा लेने से भी बच्चे के ट्रांसजेंडर होने की सम्भावना ज्यादा होती है| गर्भावस्था के शुरू के तीन महीने में किसी भी बीमारी को नज़र अंदाज़ ना करे|

गर्भवती महिला के साथ यदि कोई दुर्घटना हो जाए और इसी बीच शिशु के ऑर्गन्स को नुकसान पहुंचने पर भी बच्चे के ट्रांसजेंडर पैदा होने की सम्भावना बाद बढ़ जाती है|जेनेटिक डिसऑर्डर के कारण ट्रांसजेंडर के लगभग 10 से 15 फीसदी मामले सामने आते है| कुछ केस में ट्रांसजेंडर बच्चे के जन्म कारणों का पता नहीं चल पाता है|

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