कूर्म जयंती पर इस विधि से करें पूजा, न करें ये गलतियां

वैशाख माह की पूर्णिमा तिथि को कूर्म जयंती के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के दौरान कूर्म यानी कछुए का अवतार लिया था। उन्होंने अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को धारण किया, जिससे देवताओं और असुरों के लिए अमृत प्राप्ति का मार्ग खुला। यह अवतार धैर्य, स्थिरता और आधार का प्रतीक है।
कूर्म जयंती के दिन की गई पूजा न केवल भगवान विष्णु की कृपा दिलाती है, बल्कि घर में लक्ष्मी को स्थिर करने और वास्तु दोषों को दूर करने में भी मदद करती है।
कूर्म जयंती पूजा विधि
किसी पवित्र नदी या घर में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
एक वेदी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें।
अगर आपके पास धातु का कछुआ है, तो उसे एक पात्र में जल भरकर स्थापित करें।
भगवान को दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से स्नान कराएं।
श्री हरि को पीले फूल, पीला चंदन और केसर का तिलक लगाएं।
फल, मिठाई का भोग लगाएं।
अंत में आरती करें।
भोग – कूर्म जयंती पर भगवान को खीर या पीली मिठाई का भोग लगाना बहुत शुभ होता है। ध्यान रखें कि भोग में तुलसी दल जरूर शामिल करें, क्योंकि इसके बिना विष्णु जी भोग स्वीकार नहीं करते।
पूजन मंत्र
ॐ कूर्माय नमः।।
नमो भगवते कूर्मरूपाय।।
पूजा में न करें ये गलतियां
कछुआ अवतार स्थिरता का प्रतीक है। इस दिन घर में लड़ाई न करें और न ही किसी पर गुस्सा करें, वरना पूजा का फल समाप्त हो सकता है।
इस पावन तिथि पर मांस, मदिरा या लहसुन-प्याज का सेवन बिल्कुल न करें।
घर में कछुए की मूर्ति या प्रतीक रखा है, तो उसे गंदे हाथों से न छुएं और न ही उसे धूल जमने दें।
घर के किसी भी कोने में अंधेरा न रहने दें, खासकर शाम के समय दीपदान जरूर करें।
कूर्म जयंती का फल
माना जाता है कि कूर्म जयंती पर पूजा करने से जीवन में आने वाली बाधाएं शांत होती है और व्यापार व करियर में स्थिरता आती है। यह दिन नया घर निर्माण शुरू करने या गृह प्रवेश के लिए भी बेहद शुभ माना जाता है।





