कहीं मरीजों के इलाज से छूट रहा बच्चों का ट्यूशन तो कहीं पड़ते खाने के लाले

नई दिल्ली. बीमारी न केवल मरीज बल्कि उसके पूरे परिवार की जीवनशैली को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। इसका इलाज कराने के दौरान पनपने वाली आर्थिक तंगी से बच्चों का ट्यूशन छूट रहा है, उनको निजी स्कूलों से निकालकर सरकारी स्कूल में भर्ती कराया जा रहा है। यही नहीं, कई बार तो पारिवारिक स्थिति इतनी विकट हो जाती है कि घर में पौष्टिक खाने के भी लाले पड़ जाते हैं। यह पढ़ने में अटपटा जरूर लग रहा है, लेकिन यह सच्चाई है जो दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की ओर से किए गए अध्ययन में सामने आई है।
कहीं मरीजों के इलाज से छूट रहा बच्चों का ट्यूशन तो कहीं पड़ते खाने के लाले
एम्स के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग प्रमुख डॉ. अनूप सराया की अगुवाई में दिल्ली एम्स और हरियाणा के बल्लभगढ़ स्थित कॉम्प्रिहेंसिव रुरल हेल्थ सर्विसेज प्रोजेक्ट (सीआरएचएसपी) में इलाज के लिए आए 374 मरीजों पर यह सर्वे किया गया। इसमें पेट और हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को शामिल किया गया था। अध्ययन में ओपीडी और अस्पताल में भर्ती दोनों तरह के मरीज शामिल रहे।

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निजी स्कूल से सरकारी स्कूल में दाखिला कराया
उक्त सर्वे के अनुसार आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले उच्च और उच्च मध्य आय वर्ग वाले मरीजों में से 32 फीसदी परिवारों के बच्चों के खान-पान और निम्न आय वर्ग वाले परिवार के 39 फीसदी बच्चों के खान-पान पर बुरा प्रभाव पड़ा। कई मरीजों ने बच्चों को निजी स्कूल से सरकारी स्कूल में दाखिला कराया, ट्यूशन और कोचिंग सेंटर से नाम कटवाना पड़ा। बच्चों की किताब और कॉपी पर भी खर्च कम हो गए। शहरी क्षेत्र में 63.5 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्र के 44.9 फीसदी मरीजों के घरों में खान-पान पर खर्च कम हो गया। बच्चों को पौष्टिक आहार मिलने में दिक्कत होने लगी।
 
इलाज के लिए 40 फीसदी से अधिक मरीजों ने बेची जमीन या मवेशी
बीमारी के पहले ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले 51.3 फीसदी मरीज जबकि शहरी क्षेत्र में 65.5 फीसदी मरीज नौकरी कर रहे थे। इलाज के दौरान अथवा इलाज के बाद ग्रामीण क्षेत्र के 24.4 फीसदी और शहरी क्षेत्र के 23.4 फीसदी मरीजों के पास ही नौकरी रह पाई। कई मामलों में तो मरीज की नौकरी छूटने से उनके घर की महिलाओं और बच्चों को नौकरी करनी पड़ी। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले उच्च आय वर्ग के 46.8 फीसदी और उच्च मध्य आय वर्ग के 41.9 फीसदी मरीजों ने इलाज पर होने वाले खर्च के लिए जमीन या मवेशी तक बेच दिए।
 
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