कर्ज में डूबता अमेरिका, ईरान युद्ध ने हिला दी डॉलर की बादशाहत

दुनिया को अपनी आर्थिक ताकत से डराने वाला अमेरिका अब खुद भारी संकट में फंसता दिख रहा है। पहली बार अमेरिका का सार्वजनिक कर्ज उसकी पूरी अर्थव्यवस्था से भी बड़ा हो गया है।

मार्च के आखिर तक अमेरिका पर करीब 31.27 लाख करोड़ डॉलर का कर्ज पहुंच गया, जबकि उसकी जीडीपी 31.22 लाख करोड़ डालर रही। यानी अमेरिका जितना कमा रहा है, उससे ज्यादा कर्ज में डूब चुका है।

अब डर सिर्फ कर्ज का नहीं, बल्कि उस खतरे का है जो अमेरिका की नींव हिला सकता है। खाड़ी देशों का भरोसा अमेरिका से कमजोर पड़ने लगा है। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर बढ़ते हमलों के बाद खाड़ी देश अपने निवेश पर दोबारा विचार कर रहे हैं।

खाड़ी देशों ने अमेरिका में करीब दो लाख करोड़ डालर का निवेश कर रखा है। इसमें अमेरिकी बांड, शेयर बाजार, रियल एस्टेट और हथियार तक शामिल हैं।

मच सकता है आर्थिक भूचाल

अमेरिका किसी भी विदेशी देश को पैसा निकालने से रोक नहीं सकता। यही उसकी सबसे बड़ी मजबूरी है। अमेरिकी बाजार की ताकत यह है कि कोई भी कभी भी पैसा लगा सकता है और निकाल सकता है, लेकिन अब यही खुलापन खतरा बन गया है।

विशेषज्ञों को डर है कि अगर खाड़ी देशों ने बड़े पैमाने पर अमेरिकी संपत्तियां बेचनी शुरू कर दीं, तो शेयर बाजार और बांड बाजार में भारी गिरावट आ सकती है। ठीक वैसा ही संकट पैदा हो सकता है जैसा 2008 की मंदी में हुआ था। बाजार टूटेंगे, कर्ज बढ़ेगा और पूरी दुनिया में आर्थिक झटका महसूस होगा

डॉलर बचाने के लिए अमेरिका ने चला नया दांव

इस खतरे से बचने के लिए अमेरिका अब स्वैप लाइन का सहारा ले रहा है। इसके तहत अमेरिकी फेडरल रिजर्व दूसरे देशों को डालर देता है ताकि वे अपनी अमेरिकी संपत्तियां बेचने पर मजबूर न हों।

2008 की मंदी में भी अमेरिका ने यही तरीका अपनाया था। असल में यह पूरा खेल पेट्रोडॉलर सिस्टम पर टिका था। 1974 में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए समझौते के बाद दुनिया का तेल डालर में बिकने लगा।

खाड़ी देशों को तेल बेचकर डॉलर मिलता था और वे वही पैसा अमेरिका में निवेश कर देते थे। बदले में अमेरिका उन्हें सुरक्षा देता था।

अब टूटने लगा है पेट्रोडॉलर सिस्टम

अब यही व्यवस्था बिखरती दिख रही है। ईरान के दबाव, तेल ठिकानों पर खतरे और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने खाड़ी देशों को सतर्क कर दिया है। यही वजह है कि संयुक्त अरब अमीरात ने एक मई को ओपेक छोड़ दिया।

खाड़ी देश अब अपने तेल, कमाई और निवेश पर ज्यादा नियंत्रण चाहते हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि खाड़ी देश अब चीन की मुद्रा युआन में भी तेल व्यापार बढ़ाने के संकेत दे रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो दुनिया धीरे-धीरे डालर पर निर्भरता कम करने लगेगी।

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