कथा साहित्य से सम्मानित किए गए कहानीकार

सुलतानपुर, 20 दिसम्बर (UjjawalPrabhat.Com)। स्थानीय जिला पंचायत सभागार में ’कथा समवेत’ पत्रिका द्वारा आयोजित “माँ धनपती देवी स्मृति कथा साहित्य प्रतियोगिता में चयनित कथाकारों में आलम आज़ाद (प्रतापगढ़), अरविंद क्लेरेंस (प्रयागराज), निशा गहलौत (लखनऊ), हेमलता यादव (नई दिल्ली), अनीता श्रीवास्तव (जयपुर), शिवाशंकर पाण्डेय को अंगवस्त्र, धनराशि, सम्मानपत्र एवं स्मृतिचिह्न प्रदान करके सम्मानित किया गया। समारोह का आरम्भ माँ सरस्वती और माँ धनपती देवी की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ हुआ। दो सत्रों के इस आयोजन में प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ. सूर्यदीन यादव (नाडियाड) ने किया।
इस कार्यक्रम के आयोजक कथा समवेत के सम्पादक डॉ. शोभनाथ शुक्ल  ने समारोह में आये अतिथियों एवं कहानीकारों का स्वागत करते हुए कहा कि पुरस्कृत कहानियाँ के समय में सार्थक हस्तक्षेप की कहानियाँ हैं। अपनी भाषा, बुनावट और कहन में ये कहानियाँ पाठकों के मन में उतर जाती हैं। सम्मानित कथाकारों में आलम आज़ाद ने कहा कि पुरस्कार हमें कुछ और बेहतर करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसी क्रम में अरविंद क्लेरेंस ने कहा कि हम कहानियों में जीवन लिखते हैं न कि जीवन के लिए कहानी। डा. हेमलता ने कहानियों पर बोलते हुए कहा कि जब कोई विचार उद्वेलित करता है तभी कहानी बनती है। निशा गहलौत ने कहा पारिवारिक रिश्ते भी हमारे लिए कथावस्तु तैयार करते हैं। इसी क्रम में अनीता श्रीवास्तव ने अपनी रचना प्रक्रिया में सामाजिक परिवेश और खासकर जीवन शैली के प्रभाव की चर्चा की। शिवाशंकर पाण्डेय ने कहा यदि शोभनाथ शुक्ल जैसे पारदर्शी और पवित्र आयोजक हों तो साहित्य समृद्ध होता जाएगा। प्रतियोगिता के निर्णायक राम नारायण रमण ने चयनित कहानियों की भाषा शैली, कथावस्तु, वस्तुविन्यास आदि के विषय में अपना पक्ष रखा। कहानीकारों के सम्मान के पश्चात कथा समवेत पत्रिका के दिसम्बर अंक का लोकार्पण विजेता कहानीकारों द्वारा किया गया। इस सत्र का संचालन अवनीश त्रिपाठी ने किया। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में ’सरकारी उपेक्षा और हिंदी का बढ़ता बाज़ार’ विषय पर एक सार्थक बहस हुई। विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. शोभनाथ शुक्ल ने कहा हिंदी में अन्य भाषाओं की तुलना में ग्रहण करने की क्षमता और उसका तंत्र सबसे मजबूत है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने बाजार को बढ़ावा देने के लिए हिंदी को अन्य भाषाओं के मुकाबले अधिक इस्तेमाल में ला रहे हैं। किंतु सरकार राष्ट्रभाषा होने के बावजूद हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाने की दृढ़ इच्छा शक्ति नहीं पैदा कर पा रही हैं। वहीं डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी ने कहा हिंदी विषय से यदि रोजगार पैदा हो तो उसका विकास हो। शैलेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि सरकारी तंत्र हिंदी की पुस्तकें खरीदना नहीं चाहता। युवा साहित्यकार ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह ’रवि’ ने कहा कि हिन्दी सरकारी उपेक्षा के कारण नहीं बल्कि जन उपेक्षा के कारण पिछड़ रही है। आज हिन्दी का बाजार बहुत बढ़ा है। जिसमें सरकार का महत्वपूर्ण योगदान है। वीरेंद्र त्रिपाठी का कहना था कि हिंदी की उपेक्षा की बात भले की जा रही है, लेकिन हिंदी फिर भी पूरे विश्व बाजार में पसरती चली जा रही है। व्यंग्यकार हनुमान प्रसाद मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि सरकार ने अखबारों को विज्ञापन देने की दुर्भावनापूर्ण दोहरी नीति अपना लिया जिसके परिणाम स्वरूप तमाम पाक्षिक एवं दैनिक साप्ताहिक समाचारपत्र बन्द हो गए या बन्दी के कगार पर हैं। डॉ. करुणेश भट्ट ने कहा कि राजतंत्र और सरकारी तंत्र का दोष तो है ही लेकिन हमारा भी अपनी भाषा हिंदी के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार बना हुआ है। प्रतियोगिता के प्राथमिक निर्णायक ने प्रतियोगिता में आयी सम्पूर्ण कहानियों के विषय में विशेष टिप्पणी किया। इसी क्रम में साक्षी प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित तीन पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। जिसमें डॉ. रामप्यारे प्रजापति का कहानी संग्रह ’मुक्तिकामी शिलायें’, गुरु प्रसाद सिंह का उपन्यास ’कैसे टूटी गुलामी की जंजीरें’ और शैलेन्द्र तिवारी का उपन्यास ’विसर्जन’ सम्मिलित थे। इस सत्र की अध्यक्षता शैलेन्द्र श्रीवास्तव एवं संचालन श्याम नारायण श्रीवास्तव ने किया। इसके पश्चात समारोह में मथुरा प्रसाद सिंह ’जटायु’ के संचालन में काव्य संध्या का आयोजन किया गया। जिसमें नरेंद्र शुक्ल, साक्षी शुक्ल, रेणु अग्रहरि, जगदीश श्रीवास्तव आदि ने कविता पाठ किया। इस दौरान पूजा पाठक, प्रिया मिश्रा, भावना पाण्डेय, प्रशंसा शुक्ला, डॉ.सुशील कुमार पाण्डेय ’साहित्येन्दु’, जयंत त्रिपाठी, डॉ.सूर्यदीन यादव, डॉ. रामप्यारे प्रजापति, सुरेश चंद्र शर्मा, कपिल देव सिंह, शैलेन्द्र तिवारी, डॉ. गीता सिंह, प्रीति त्रिपाठी, अन्नू त्रिपाठी, सन्दीप सिंह समेत आदि मौजूद रहे।
नीरज तिवारी

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