…ऐसे ही रहे हालात तो 50 साल में भी नहीं सुधरेगी व्यवस्था

ये तीनों खबरें झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं और सरकारी संस्थानों में मानवीय संवेदना की पोल खोलती हैं। राज्य सरकार हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है, दर्जनों सरकारी योजनाएं चलाती हैं, लेकिन नतीजा आपके सामने है। किसी की मौत हो जाये और एंबुलेंस नहीं मिले। कंधे पर या साइकिल पर अपने बच्चों के शव को लेकर घर जायें, इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है।
सरकारी अस्पताल हैं ही इसलिए, ताकि गरीब वहां इलाज करा सकें। उनकी जान बच सके। अगर उनके पास पैसा होता, तो वे उन बड़े अस्पतालों में नहीं जाते, जहां जनता के टैक्स के पैसों पर पलने वाले अफसर-नेता और उनके परिजन इलाज कराते हैं। या धनकुबेर और उनके परिजन इलाज कराने जाते हैं। गरीब के पैसे कम पड़ गये, जांच नहीं हुई और जान चली गयी। ये तो चंद मामले हैं, लेकिन हजारों मामले दब जा रहे हैं। राज्य की छोटी-छोटी जगहों के मामले तो बाहर आते ही नहीं। सुविधाएं हैं नहीं, अस्पतालों में डॉक्टर बैठते नहीं, कोई सीनियर अफसर पूछने वाला नहीं। मुख्यमंत्री के आदेश तक की परवाह ये नहीं करते। जब तक सिस्टम काम नहीं करेगा, कड़ाई नहीं होगी, हालात ऐसे ही रहेंगे, बल्कि और बिगड़ेंगे।
जमशेदपुर में एमजीएम अस्पताल है। 30 दिन में 60 बच्चों की मौत हो गयी। ये आंकड़े सरकार के हैं। उसी एमजीएम में मई से अगस्त तक का आंकड़ा बताता है कि इन चार माह में 164 बच्चों की मौत हुई है। फिर भी कोई चर्चा नहीं।
ठीक है, अस्पताल है। इलाज के लिए लोग आते हैं। कुछ की मौत हो सकती है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में मौत, लगभग गोरखपुर वाली स्थिति। क्यों और कैसे मरे ये बच्चे? इनमें से अधिकतर बच्चे एक साल से कम उम्र के थे। दुनिया ठीक से देखने के पहले ही ये बच्चे चल बसे। दो साल पहले एक आंकड़ा आया था। झारखंड में हर साल 45 हजार बच्चों (पांच साल से कम उम्र) की मौत हो जाती है। हाइकोर्ट ने इस पर संज्ञान लिया था। आज भी हालात में बहुत परिवर्तन नहीं हुआ।
गर्भवती माताओं के लिए सरकार ने कई सुविधाएं देने की घोषणा की है। फिर भी बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट जारी हो चुकी है। झारखंड का हाल बहुत बुरा है। 47 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। आखिर कहां जा रहा है सरकार का पैसा, बच्चों और माताओं तक पहुंच रहा है या नहीं?
हालात देखिए। वर्ष 2005-06 के सर्वे के दौरान पाया गया था कि झारखंड में छह माह से पांच साल के बीच के 70.3 फीसदी बच्चों में खून की कमी है। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद 2015-16 का आंकड़ा देखिए। एनिमिक बच्चे हैं 69.9 फीसदी। यानी 10 साल में यह विभाग सिर्फ 0.4 फीसदी ही सुधार कर सका। या तो सरकारी आंकड़े गलत हैं या विभाग अक्षम है, जिस राज्य में पांच साल से कम उम्र के 69.9 फीसदी बच्चे एनिमिक (खून की कमी) होंगे, वहां ऐसी मौतें तो होंगी ही।
इतने बड़े मुद्दे पर विधानसभा में कभी कोई चर्चा नहीं होती। कोई पूछताछ नहीं होती कि स्वास्थ्य के अफसर-कर्मचारी कर क्या रहे हैं? जिस विभाग में करोड़ों रुपये वेतन पर खर्च होते हैं, वहां काम नहीं हो, तो ऐसे विभाग का रहना या नहीं रहना बराबर ही है। सिर्फ बच्चों की बात नहीं है। गर्भवती माता खुद एनिमिक हैं। 2005-06 में 68.5 फीसदी गर्भवती माताएं एनिमिक थीं।
दस साल बाद यानी 2015-16 (एनएफएचएफ सर्वे) में भी यह आंकड़ा मामूली घट कर 62.6 फीसदी पर आया। इतना धीमा सुधार होगा, तो 50 साल बाद भी झारखंड की गर्भवती माताओं और बच्चों के हालात नहीं सुधरेंगे।
अब समय आ गया है जमीनी हकीकत जान कर कार्रवाई करने का। सरकार पैसा खर्च कर रही है, लेकिन, हालात नहीं सुधर रहे। कौन खा जा रहा है पैसा या पैसा क्यों नहीं सही जगह पर पहुंच रहा है। कैसे अस्पतालों के हालात सुधरेंगे। अगर सरकार ठान ले, तो स्थिति सुधरेगी ही।
देखिए, रांची में सदर अस्पताल कई सालों से बन कर पड़ा था। अब वहां काम हो रहा है और बेहतर तरीके से। गरीब महिलाएं वहां जा रही हैं और बेहतर इलाज भी हो रहा है। ऐसी ही व्यवस्था सभी जिलों में रिम्स में, एमजीएम में करनी होगी। एक भी बच्चे की मौत कुपोषण से होना, एक भी गर्भवती माता की मौत इलाज के अभाव में होना या कुपोषण-खून की कमी हो से होना शर्मनाक है। अफसर अपनी जिम्मेवारी समझें।
जमशेदपुर के एमजीएम में हुई मौत इसलिए और चिंता की बात है, क्योंकि पूर्वी सिंहभूमि को झारखंड के अन्य जिलों की तुलना में बेहतर जिला माना जाता है। अगर वहां ये हालात हैं, तो राज्य के अन्य जिलों में कैसे होंगे, यह समझा जा सकता है।
सरकार उन गरीब महिलाओं की पीड़ा को समझे, जिनके बच्चे की कुपोषण और इलाज के अभाव में मौत हुई है और इसका स्थायी समाधान निकालने की दिशा में बढ़े। यह समझा जा सकता है कि चीजें इतनी बिगड़ी हुई हैं कि रातों रात कोई बड़ा बदलाव नहीं हो सकता है, लेकिन सुधार की दिशा में प्रयास तो हो सकता है। अगर सही प्रयास हो, तो अच्छे नतीजे आयेंगे ही।





