श्रीराम को सुनाना था मृत्युदंड, लेकिन अनुज ने ली समाधि!

श्रीराम रावण का वध कर अयोध्या आ चुके थे। वह अयोध्या के राजा नियुक्त कर दिए गए। सब कुछ बेहतर चल रहा था।

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श्रीराम को सुनाना था मृत्युदंड, लेकिन अनुज ने ली समाधि!

तभी एक दिन यम देवता किसी जरूरी बात पर चर्चा करने के लिए चर्चा शुरु करने से पहले यम ने श्रीराम से कहा, प्रभु आप जो भी प्रतिज्ञा करते हैं, उसे अवश्य पूर्ण करते हैं। मैं भी आपसे एक वचन मांगता हूं कि जब तक मेरे और आपके बीच वार्तालाप चले तो हमारे बीच कोई नहीं आएगा और जो आएगा, आपको उसे मृत्युदंड देना पड़ेगा। प्रभु श्रीराम ने यम को इस बात की सहमति दे दी। उन्होंने लक्ष्मण को इस बारे में बताया कि जब तक चर्चा चले किसी को अंदर न आने दें। लक्ष्मण आज्ञा मानकर द्वारपाल बनकर खड़े हो जाते है।

 
लेकिन वहां कुछ समय बाद ऋषि दुर्वासा आए, उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि वह ऋषि आगमन की सूचना दे दें। प्रभु ने तो अंदर आने के लिए मना किया था। तब वह ऋषि से विनम्रता से यह कार्य करने के लिए मना कर दिया। ऋषि दुर्वासा नाराज हो गए। और उन्होंने पूरे अयोध्या को श्राप देने की बात कही।
 
लक्ष्मण असमंजस में थे। तब पूरी अयोध्या को श्राप से बचाने के लिए स्वयं आगमन की सूचना देने प्रभु राम के पास गए।
 चूंकि लक्ष्मण मना करने पर भी प्रभु से मिले तो यम नाराज हो गए। और प्रभु राम से बोले, आपको लक्ष्मण को मृत्युदंड देना होगा।
 प्रभु राम दुविधा में थे। तब उन्होंने गुरु वशिष्ठ का स्मरण किया। तब गुरुदेव ने कहा किसी प्रिय का त्याग कर देना उसकी मृत्यु के समान है। इस तरह लक्ष्णम का त्याग करके उन्हें मृत्युदंड से बचा सकते हैं।
 
जब लक्ष्मण जी को यह बात पता चली तो वह बोले, ‘भ्राता श्री मैं आपसे दूर नहीं रह सकता। इससे अच्छा है कि मैं मृत्यु को गले लगा लूं। क्योंकि रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई’ और इस तरह लक्ष्मण जी ने जल समाधि ले ली।
 
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