वृंदावन की विधवाओं ने पहली बार मंदिर में खेली होली

phpThumb_generated_thumbnail (1)एजेन्सी/417 साल की रूढि़वादी परंपरा पर आंसुओं से घुले गुलाल का रंग चढ़ गया। बेरंग जिंदगी जीने को मजबूर वृंदावन की विधवाओं ने सोमवार को पहली बार यहां के गोपीनाथ मंदिर में अपने ‘कान्हा’ और उनके भक्तों के साथ जमकर होली खेली।

शंखनाथ, सूखे फूलों और हवा में उड़ते रंगों के बीच सभी बेडिय़ां टूट गईं। सामाजिक सौहार्द का परिचय देते हुए संस्कृत के विद्यार्थी, विद्वान, स्थानीय लोग और पुजारी भी उनके साथ हो लिए। ‘भक्तिÓ का रंग इस कदर चढ़ा कि कोई भेदभाव ही नहीं बचा।

अपने परिवारों द्वारा त्याग दी गईं इन विधवाओं की इस होली में बड़ी संख्या में संस्कृत के विद्यार्थी और विद्वान भी शामिल हुए। जाने-माने समाज सुधारक और ‘सुलभ इंटरनेशनल’ के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक भी होली के इस जश्न में शामिल हुए। बिंदेश्वर देश में विधवा विरोधी मान्यताओं के विरोध में अभियान चलाने के लिए जाने जाते हैं।

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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विधवाओं की स्थिति के बारे में 2012 की गई टिप्पणियों को देखते हुए सुलभ इंटरनेशनल वाराणसी व वृंदावन में 1,500 विधवाओं की देखरेख कर रहा है। बिंदेश्वर पाठक ने बताया है कि सुलभ ने उन्हें (विधवाओं) समाज की मुख्यधारा से जोडऩे की कोशिश करते हुए करीब तीन साल पहले उनके लिए विधवा आश्रम में होली का आयोजन करना शुरू किया। लेकिन, इस बार यह एक खास होली थी, क्योंकि यह एक सामाजिक स्वीकृति देने के लिए एक लोकप्रिय मंदिर में आयोजित की गई थी।

-1599 में बने गोपीनाथ मंदिर में पहली बार विधवाओं ने खेली होली

-1,200 किग्रा गुलाल उड़ाया

-1,500 किग्रा गुलाब व गेंदे की पंखुडिय़ों का किया उपयोग

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