विचार- सबसे महत्वपूर्ण है बिहार का भविष्य

लॉर्ड पामर्स्टन ने 1851 में कहा था कि ‘किसी देश को सर्वकालिक दोस्त या दुश्मन के रूप में चिह्नित करना एक संकीर्ण नीति है। हमारा न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन। स्थायी सिर्फ हमारे हित होते हैं और उन्हीं हितों के अनुसार हमें आचरण करना चाहिए। यही हमारा कर्तव्य है।’ हाल ही में भाजपा के साथ गठजोड़ करने के लिए तमाम आलोचनाएं झेलने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार-बार यही कहते रहे हैं कि बिहार के हितों की रक्षा ही उनका सर्वकालिक कर्तव्य है। ऐसे में, मौजूं सवाल यही है कि क्या उनका ताजा फैसला बिहार के दीर्घकालिक हितों की रक्षा करने वाला है?
पिछले दो वर्षों में राजद के साथ गठबंधन के दौरान बिहार के विकास का इंजन वाकई कई मामलों में थम गया था। पहली बात तो यह कि लोग मानने लगे थे कि नेतृत्व में एक राय नहीं है। अपराधों में तेजी और सुरक्षा के माहौल में आई गिरावट को देखेें, तो यही लगता था कि विकास की तरफ सरकार का ध्यान ही नहीं है।
नीतीश कुमार के सियासी सफर की दो खास पहचान रही हैं- एक आर्थिक शुचिता और दूसरी समग्र विकास। इनमें से किसी एक के साथ भी समझौता उनकी वह पहचान खत्म करने वाला होता। यही विशेषताएं प्रधानमंत्री मोदी की भी रही हैं। ऐसे में, दोनों के बीच एक तार्किक गठबंधन का जन्म लेना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता।
नीतीश कुमार मानते रहे हैं कि बिहार जैसे जातीय और वर्गीय विभाजन वाले राज्य में पहचान की राजनीति सर्वोपरि नहीं हो सकती। और इस पर निर्भरता को विकास के जरिए ही खत्म किया जा सकता है। विकास की राजनीति, पहचान की राजनीति को किस तरह खत्म कर सकती है, यह नीतीश से बेहतर कोई दूसरा नहीं समझ सकता।
धर्मनिरपेक्षता को ढाल बनाकर भ्रष्टाचार की अनदेखी नुकसानदेह होता है। धर्मनिरपेक्षता को बहाना बनाकर विकास या आर्थिक शुचिता से भी समझौता नहीं किया जा सकता। लिहाजा मेरा मानना है कि बिहार का भविष्य इन चार नजरियों पर निर्भर करेगा।
पहला यह कि पूर्व में अधूरे रह गए एजेंडे को पूरा कीजिए। नीतीश कुमार द्वारा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के अभियान के दौरान रघुराम राजन कमेटी बनाई गई थी, जिसका उद्देश्य सभी राज्यों के लिए एक समग्र सूचकांक विकसित करना था।
उसने प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, महिला साक्षरता, शहरीकरण और वित्तीय समावेशन पर आधारित जो बहुआयामी सूचकांक तैयार किए, उसमें बिहार को विकास के मामले में सबसे फिसड्डी पाया गया। अब होना यह चाहिए कि अगले कुछ वर्षों में बिहार को इन तमाम मानकों पर राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंचाया जाए।
यह भी पढ़ें: 3 महीने से नौकरानी का कर रहा था रेप
दूसरा, 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार के लिए ‘स्पेशल पैकेज’ की घोषणा की थी, जिसमें खासतौर से आर्थिक व सामाजिक ढांचे पर जोर देते हुए 1.25 लाख करोड़ रुपये के कई योजनाएं शुरू करने की बात थी।
बिहार पैकेज की निगरानी के लिए प्रधानमंत्री दफ्तर में स्पेशल सेल का गठन भी हुआ था। नीतीश सरकार का उद्देश्य इस पैकेज को तत्काल जमीन पर उतारना होना चाहिए। राज्य व केंद्र को एक संयुक्त मशीनरी भी बनानी चाहिए, जो नियत समय पर इस पैकेज के क्रियान्वयन की निगरानी करे। विकास कार्यों की मासिक रिपोर्ट भी बननी चाहिए।
तीसरा, प्रधानमंत्री द्वारा घोषित पैकेज में वर्णित घटकों के परे भी बिहार में काम किए जाने की जरूरत है। रघुराम राजन कमिटी में दर्ज मसलों पर तो काम हो ही, विकास के तिहरे इंजन को भी गति दी जाए, यानी तीन तरफा विकास हो। विकास का पहला जरिया सार्वजनिक खर्च बढ़ाना है। यह 2005 से 2013 के दौरान बिहार के विकास का आधार रहा है।
प्रधानमंत्री का पैकेज भी सार्वजनिक खर्च बढ़ाने में सहायक है। दूसरा जरिया निजी निवेश का बढ़ावा देने का होना चाहिए। चूंकि इसके लिए नियामक व अन्य उपायों की जरूरत होती है, लिहाजा इस पर ध्यान देना होगा। बेहतर सुरक्षा व माहौल और दोनों के बीच का अनकहा संबंध, जिसे ‘शांति लाभांश’ कहते हैं और जो सरकार मुहैया कराएगी, वह भी एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक बनेगा। बिहार में विदेशी निवेश बढ़ाने वाले पहलुओं पर भी गौर करने की जरूरत है। संयोग से पर्यटन, राष्ट्रीय विरासत और उसका बहुआयामी प्रभाव ऐसा ही एक क्षेत्र है, जो बिहार में विदेशी निवेश बढ़ा सकता है।
नए कौशल पर जोर और इस पर आधारित नौकरियां बिहार को एक मैन्युफैक्चरिंग हब बना सकती है। स्टार्ट अप और निजी उद्यमियों के साथ कुछ अन्य पहल रोजगार के अवसर बढ़ाने वाले होंगे। बिहार को ‘आयात केंद्र’ बनाना विकास का तीसरा इंजन होगा। यहां युवाओं की आबादी है और श्रम पलायन के अनुपात को ध्यान में रखते हुए नीति आयोग द्वारा सुझाए गए प्रतिस्पद्र्धी श्रम आधारित उद्योगों पर काम हो, तो काफी फायदेमंद हो सकता है।
संक्षेप में कहें, तो बिहार में विकास का अगला चरण तीन कारकों पर निर्भर रहना चाहिए। पहला, प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए पैकेज को निष्पक्षता से लागू करते हुए सार्वजनिक खर्च बढ़ाना। दूसरा, निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए खास प्रयास करना। अच्छी बात है कि काफी अरसे बाद केंद्र व राज्य में एक तरह की ही सरकार है और दोनों की सोच भी मिलती है। यह संयोग निजी निवेश को बढ़ाने में मददगार हो सकता है। और तीसरा, बिहार को एक निर्यात केंद्र के रूप में विकसित किया जाना, जिसमें जोर कौशल विकास के साथ रोजगार सृजन पर हो।
कहा जाता है कि एक सप्ताह राजनीति के लिहाज से एक लंबा वक्त है। मगर हकीकत में यह कई मामलों में सच है। नीतीश कुमार ने कई त्वरित फैसले बीते एक सप्ताह में लिए हैं। बताता चलूं कि लॉर्ड निकोलस स्टर्न और मैं लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में जिस वक्त एक समारोह में द न्यू बिहार नामक किताब का विमोचन कर रहे थे, उसी सप्ताह बिहार में भाजपा और जद (यू) का गठबंधन टूटा था।
इस किताब में मैंने यह बताया है कि कैसे 2005-06 के बाद बिहार में विकास परवान चढ़ा और प्रति व्यक्ति आय, जो 1991-2005 के दरम्यान औसतन 0.9 फीसदी थी, वह 2006-12 के दौरान 10.4 फीसदी हो गई। न तो यह एक शुरुआत थी और न ही यह कोई अंत है। लिहाजा एक बेहतर मौका हमारे पास है, जिसका लाभ उठाया जाना चाहिए। नीतीश कुमार के भविष्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बिहार का भविष्य है।
नोट: (ये लेखक के अपने विचार हैं)





