लीबिया में पाकिस्तान के गंदे खेल और 4 अरब डॉलर का ‘चीनी कनेक्शन’ के मायने समझिए

दुनियाभर में कटोरा लेकर घूम रहा नापाक पड़ोसी पाकिस्तान इन दिनों खुद ‘शांतिदूत’ साबित करने की कोशिश में लगा है। हालांकि अब उसके इस नापाक डिप्लोमेसी की हवा पूरी निकल चुकी है।

कारण है कि एक तरफ पाकिस्तान लीबिया में पिछले 15 सालों से चल रहे गृहयुद्ध को खत्म कराने के लिए मध्यस्थ बनने का नाटक कर रहा है, तो दूसरी तरफ उसी जंग को भड़काने के लिए करीब 33,000 करोड़ रुपये के घातक हथियार बेच रहा है।

ड्रैगन के हाथों की कठपुतली पाकिस्तान

इस बात को ऐसे समझिए कि लीबिया गृहयुद्ध रोकने का दिखावा और हथियारों के सौदा करने के पाकिस्तान के इस नापाक खेल के पीछे किसी और का नहीं, बल्कि चीन का दिमाग है। आइए हम आपको बताते हैं कि कैसे पाकिस्तान का यह ‘शांति मिशन’ असल में हथियारों की एक बड़ी डील है और कैसे इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी किरकिरी हो रही है?

अमेरिका-ईरान सीजफायर की फुस्स हुई हवा

साल 2026 की शुरुआत में पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम कराकर खूब वाहवाही बटोरी थी। लेकिन पाकिस्तान की यह तथाकथित कामयाबी महज तीन हफ्तों में ही ताश के पत्तों की तरह ढह गई।

अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर टूट गया। अमेरिकी हमलों में ईरान के कई सैनिक मारे गए, तो वहीं ईरान ने भी जवाबी हमले किए। ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को बंद कर दिया, जिससे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। जब ईरान-अमेरिका मामले में पाकिस्तान की मध्यस्थता सुपरफ्लॉप साबित हुई, तो अपनी गिरती साख को बचाने के लिए पाकिस्तान ने अपना रुख चुपके से ‘लीबिया’ की तरफ मोड़ दिया।

लीबिया में पाकिस्तान की ‘दोगली’ नीति

लीबिया साल 2011 में मुअम्मर गद्दाफी की मौत के बाद से ही दो हिस्सों में बंटा हुआ है। पश्चिमी हिस्सा में संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा मान्यता प्राप्त सरकार है, जिसे तुर्किए और कतर का समर्थन हासिल है। वहीं पूर्वी हिस्से पर बागी जनरल खलीफा हफ्तार और उसकी सेना (LNA) का कब्जा है।

पाकिस्तान इन दोनों गुटों के बीच समझौता कराने का नाटक कर रहा है। लेकिन इस नाटक के पीछे का सच बेहद हैरान करने वाला है। इस बात को ऐसे समझिए कि जिस वक्त पाकिस्तान के अधिकारी दोनों गुटों में शांति वार्ता की बात कर रहे थे, ठीक उसी समय पाकिस्तान ने पूर्वी हिस्से के बागी जनरल खलीफा हफ्तार की सेना के साथ 4 अरब डॉलर का गुप्त रक्षा समझौता फाइनल कर लिया।

इस समझौते के तहत पाकिस्तान हफ्तार की सेना को 16 जेएफ-17 (JF-17) लड़ाकू विमान और अन्य सैन्य उपकरण बेचने जा रहा है। यानी पाकिस्तान जिस आग को बुझाने का दावा कर रहा है, उसी में खुद ही घी डालने का काम भी कर रहा है।

इस पूरे खेल में ‘चीन’ का क्या फायदा है?

बता दें कि पाकिस्तान जो लड़ाकू विमान (JF-17) लीबिया को बेच रहा है, वह पूरी तरह से पाकिस्तानी नहीं है। इसे चीन और पाकिस्तान ने मिलकर विकसित किया है। इसमें लगने वाली तकनीक, रडार और इंजन सब चीनी हैं।

चीन का ‘प्रॉक्सि’ एजेंट बना पाकिस्तान

चीन सीधे तौर पर लीबिया जैसी संवेदनशील जगहों पर हथियार बेचकर अपनी वैश्विक छवि खराब नहीं करना चाहता। इसलिए वह पाकिस्तान को आगे करके अपना माल बेच रहा है। इस डील से चीन का सैन्य और रणनीतिक प्रभाव नॉर्थ अफ्रीका में बढ़ रहा है, लेकिन दुनिया की नजरों में विलेन सिर्फ पाकिस्तान बन रहा है।

पाकिस्तान की मजबूरी कैसी?

पाकिस्तान की आर्थिक हालत बेहद खराब है। उसे डॉलर की सख्त जरूरत है। इसलिए वह पैसों के लिए किसी भी जंग में हथियार सप्लाई करने को तैयार है, भले ही इसके लिए उसे ‘शांतिदूत’ का मुखौटा क्यों न उतारना पड़े।

कुल मिलाकर पाकिस्तान का यह दोहरा चरित्र अब पूरी दुनिया के सामने आ चुका है। एक तरफ वह खुद को जिम्मेदार देश दिखाकर दुनिया में अपनी इज्जत बढ़ाना चाहता है, तो दूसरी तरफ पैसों के लालच में गृहयुद्ध से जूझ रहे देशों को हथियार सप्लाई कर रहा है।

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