रिश्तों को वेंटिलेटर पर पहुंचा गई अख़लाक़ की मौत

लखनऊakhlaq. दादरी के जिस अखलाक को गोमांस के नाम पर भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला, उसके फ्रिज में मिला गोश्त बकरे का निकला. फोरेंसिक टेस्ट में यह खुलासा हुआ कि अख़लाक़ के फ्रिज में रखा गोश्त मटन पाया गया है. 28 सितम्बर की रात को फ्रिज में गोमांस रखे जाने के इलज़ाम में अख़लाक़ का क़त्ल कर दिया गया और उसके बेटे को वेंटिलेटर पर पहुंचा दिया गया. अख़लाक़ दफ्न हो चुके हैं और उनका बेटा दानिश ज़िन्दगी की जंग लड़ रहा है.

फारेंसिक रिपोर्ट आने के बाद साजिदा का वह सवाल मौजू हो गया है कि गोश्त बकरे का साबित हुआ तो मेरे अब्बा को सही-सलामत लौटा देंगे. मेहनत-मजदूरी कर परिवार का पेट पालने वाले अख़लाक़ ने अपने एक बेटे को वायुसेना का इंजीनियर बनाया था. अख़लाक़ अपने परिवार को अपनी मेहनत के दम पर समाज में सर उठाकर चलने के काबिल बना रहे थे लेकिन अफवाहों की राजनीति और अफवाहों के आधार पर जुर्म करने वालों ने एक सीधे और सच्चे अख़लाक़ को मार डाला.

अपनी पांच पुश्तों से दादरी में रह रहे अख़लाक़ अगर ऐसी जगह सुरक्षित नहीं थे तो कोई कहाँ सुरक्षित रह सकता है. वायुसेना ने दिल्ली की एयरफोर्स कालोनी में उनके परिवार को घर दिया है. यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 45 लाख रुपये मुआवजा दिया है. इलाके के सभ्रांत लोगों ने अख़लाक़ के परिवार की हर संभव मदद की बात कही है लेकिन गोमांस के नाम पर जो कलंक लगा उसका क्या. गोश्त का थोक में व्यापार करने वाले विधायक संगीत सोम ने अख़लाक़ के परिवार के लिए जो कहा उसका क्या. क्या मुआवज़े की राशि से परिवार में वह जूनून लौट सकता है जो परिवार को सम्मानजनक स्थान दिलाने की अख़लाक़ की जद्दोजहद में था. क्या फारेंसिक रिपोर्ट से भीड़ के दिल में भरी दुश्मनी खत्म हो जायेगी.

अख़लाक़ तो अब लौट नहीं सकते. लेकिन फारेंसिक रिपोर्ट आने के पहले तक जो बयानबाजियां साक्षियों,प्राचियों, योगियों और काटजुओं ने की हैं उसके लिए इन्हें कभी शर्म आयेगी. बेहतर होगा कि अख़लाक़ के गाँव में जिस घर का बछड़ा 16 सितम्बर को खोया था उस परिवार से पूछताछ हो. मन्दिर के उस पुजारी से सवाल हों जिसने मंदिर के लाउड स्पीकर पर कहा कि अख़लाक़ का परिवार गोमांस खाता है. उन युवकों की तलाश हो जिन्होंने मंदिर में नारेबाजी करने के बाद भीड़ को उत्तेजित किया.

इस सबके साथ-साथ गाँव के उन लोगों की मुश्कें भी कसी जानी चाहिए जिन्होंने गाँव में लोगों को आने से रोका. मीडिया की गाड़ियाँ तोडीं, ज़ाहिर है कि यह लोग इस बात से परेशान थे कि मीडिया की वजह से वारदात को अंजाम देने वाले पुलिस की गिरफ्त में आ जायेंगे. केन्द्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा को तो इतनी बड़ी घटना महज़ हादसा लगी.

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