रंगों से भी बनती है बिगड़ी हुई तकदीर, जानिए कैसे

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रंगों का हमारे सम्पूर्ण जीवन में अत्यधिक प्रभाव पड़ता हैं। मान लीजिए अगर संसार में रंग नहीं होते तो दुनिया बड़ी अजीब सी लगती इसलिए प्रकृति ने रंगों के रूप में अमूल्य उपहार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में बिखेर दिया है। क्या कभी आपके मन में यह सवाल उठा है की आखिर रंग है क्या चीज तो उत्तर है की रौशनी के उनचालीसवां स्पंदन अर्थात कंपन को रंग कहते हैं। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड की हर वस्तु पर सूर्य की किरणों का असर होता है, ठीक उसी भांति ही रंगों का भी असर होता है। व्यवहारात्मक रूप से देखें की जिस दिन आकाश बादलों से घिरा रहता है तो अग्नि मंद हो जाती है, शरीर सुस्ताने लग जाता है और अगर धूप होती है तो व्यक्ति में स्फूर्ति आ जाती है। जिस प्रकार सूर्य के ताप व प्रकाश का हमारे मन मस्तिष्क व देह पर प्रभाव पड़ता है, ठीक उसी भांति ही रंगों का हमारे मन मस्तिष्क व देह पर प्रभाव पड़ता है। ज्योतिष वास्तु एवं अंकशास्त्र की दृष्टिकोण से भी रंगों का जीवन पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। आइए इस लेख के माध्यम से जानते हैं।  रंगों से भी बनती है बिगड़ी हुई तकदीर, जानिए कैसे
मान लीजिए व्यक्ति की कुंडली में सूर्य मरकेश होकर त्रिक भाव में बैठा है तो सूर्य की रश्मियों का प्रभाव जीवन में बुरा पड़ेगा। अतः वास्तु के अनुसार व्यक्ति के पूर्व दिशा में दोष होगा अंकशास्त्र के आधार पर अंक “1” का प्रभाव कम करके या लाल या महरून रंग का प्रयोग न करके से उस रश्मि के प्रभाव की नेगटिविटी को कम किया जा सकता है। व्यक्ति पर सूर्य का प्रभाव कम होने पर आंख, हड्डी, हृदय आदि के रोग से ग्रस्त होने की संभावना रहती है। मान लीजिए कुंडली में सूर्य शुभ भाव का स्वामी है पर नीच का होकर शत्रु भाव में बैठा हुआ है तो सूर्य की रश्मियों का प्रभाव जीवन पर कमजोर होगा अतः वास्तु के अनुसार व्यक्ति के पूर्व दिशा से सम्पूर्ण लाभ नहीं मिलेगा। अंक ज्योतिष के आधार पर एक अंक के प्रभाव को बढ़ाकर या लाल या महरून रंग का इस्तेमाल को बढ़ाकर उस रश्मि के प्रभाव की कमी को दूर किया जा सकता है। व्यक्ति पर सूर्य का शुभ प्रभाव पड़ने पर उसे नाम, कामयाबी,धन, दौलत व पुत्र संतान की प्राप्ति होती है।
अगर किसी कुंडली में चंद्र कमजोर हो या वास्तु में उत्तर-पश्चिम दिशा में दोष हो या व्यक्ति पर 2 अंक का प्रभाव कम हो तो सफेद रंग का अधिक प्रयोग करने से मानसिक शांति, सौम्यता, व्यवहार कुशलता के साथ-साथ चंद्र के दोष से उत्पन्न बीमारियां तथा सर्दी-खांसी आदि में लाभ मिलता है। अगर किसी कुंडली में गुरु कमजोर है या ईशान कोण में दोष है या 3 अंक के प्रभाव में कमी होने पर केसरी व पीला रंग के प्रयोग करने से लीवर की बीमारियां, वंश वृद्धि में कमी, ज्ञान की कमी दूर होती है। अगर किसी कुंडली में राहु कमजोर हो या दक्षिण-पश्चिम की दिशा में दोष हो या 4 अंक का प्रभाव कम हो तो नीले रंग का प्रयोग करने से स्नायु-तंत्र से संबंधित बीमारियां, लकवा, पोलियो को ठीक किया जा सकता है। यदि किसी कुंडली में बुध की स्थिति कमजोर हो, घर की उत्तर दिशा में दोष हो या 5 अंक का प्रभाव कम रहे तो बुद्धि, विवेक में कमी बनी रहती है। ऐसी स्थिति में वाणी के प्रभाव में भी कमी रहेगी।  बुध को बल देने हेतु हरे रंगं का प्रयोग करना चाहिए। 
यदि किसी कुंडली में केतु की स्थिति कमजोर हो, या इस पर 7 अंक का प्रभाव कम हो तो घाव, ज़ख्म, फोड़ा, फुंसी, की शिकायत बनी रहती है। अतः केतू को बल हेतु ग्रे कलर का अधिक इस्तेमाल करना चाहिए। अगर कुंडली में शनि कमजोर होने पर या पश्चिम दिशा में दोष हो या 8 का प्रभाव कम हो तो व्यक्ति को मानसिक अशांति के साथ वात एवं गठिया की शिकायत होती है। शनि को बल देने हेतु काले रंग का अधिक इस्तेमाल करना चाहिए। यदि कुंडली में मंगल की स्थिति कमजोर हो या घर की दक्षिण दिशा में दोष रहे या 9 अंक का प्रभाव कम हो तो स्फूर्ति व उत्साह में कमी, अस्थि-मज्जा में विकार देखने को मिलता है। अतः नारंगी रंग का प्रयोग अधिक करना चाहिए। अगर रंगों का सही चुनाव व प्रयोग किया जाए तो रोगों से छूटकारा मिल सकता है। यदि रंगों का सही इस्तेमाल न किया जाए तो कष्ट एवं पीड़ा बनी रहती है। अतः जीवन में रंगों का सही इस्तेमाल कर इसे खुशहाल बनाया जा सकता है और हर क्षेत्र में सफलता पाई जा सकती है।

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