मौसम विभाग के इस विश्लेषण पर जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल ने भी जताई चिंता

साल दर साल बढ़ते तापमान से विकट गर्मी का दायरा ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि ठंड में भी गर्मी का एहसास होने लगा है।  भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department) के इस विश्लेषण पर जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल (आइपीसीसी) ने भी चिंता जताई है। वर्तमान में ग्लोबल वार्मिंग वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है। इसका असर दुनिया के हर कोने में देखा जा रहा है। कहीं अत्याधिक गर्मी पड़ रही है तो कहीं सामान्य से बहुत अधिक वर्षा हो रही है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन का नतीजा है। भविष्य में इससे मौसम की विविधता का संतुलन ही नहीं, उस पर टिकी अर्थव्यस्था की रीढ़ भी प्रभावित हो सकती है।

मौसम विज्ञान विभाग का आकलन
वार्षिक जलवायु सारांश- 2018 के मुताबिक, 2018 में देश का तापमान 1981 से 2010 तक के औसत से 0.4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा। लिहाजा 1901 से अब तक का यह छठा सबसे गर्म वर्ष रहा। जाड़े में भी औसत तापमान में 0.59 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि सामने आई। इसके मद्देनजर 2018 का वर्ष 1901 से अब तक का पांचवां सबसे गर्म वर्ष रहा। देश के उत्तर और उत्तर पश्चिमी भागों में तो औसत तापमान एक डिग्री सेल्सियस तक अधिक रहा। सूखा-सैलाब, चक्रवात व तूफान के कारण प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता भी बढ़ गई है।

आइपीसीसी की रिपोर्ट में चिंता
आइपीसीसी की एक रिपोर्ट एसआर 1.5 (स्पेशल रिपोर्ट ऑन 1.5 डिग्री सेल्सियस) साफ तौर पर चेतावनी देती है कि अगर वर्ष 2050 तक कुल कार्बन उत्सर्जन शून्य तक नहीं आया तो तापमान में यह वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंच जाएगी। तापमान की यह बढोतरी कई मुश्किलें खड़ी कर सकती है। मसलन मानसून के हेरफेर और प्राकृतिक आपदाओं के कारण नुकसान का बोझ बड़ा हो सकता है।

सीएसई की रिपोर्ट भी चौंकाती है
सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की एक अध्ययन रिपोर्ट बताती है कि बढ़ते तापमान के कारण लू जैसी समस्या भी विकराल हुई है। अकेले लू की वजह से वर्ष 2017 में देश भर में 375 मौतें हुईं थीं। वहीं आकाशीय बिजली के चलते 750 लोगों ने अपनी जान गंवाई। मौसम में आया यह परिवर्तन भी चिंता बढ़ा रहा है।

वैश्चिवक तापमान में कमी के प्रयास जरूरी
वहीं, डा. केजे रमेश (पूर्व महानिदेशक, मौसम विज्ञान विभाग) के मुताबिक, प्राथमिक स्तर पर तापमान में वृद्धि की वजह जलवायु परिवर्तन ही सामने आ रही है। इसी के कारण गर्मी, सर्दी, बरसात चरम पर पहुंच रही है। या तो बहुत ज्यादा या बहुत कम। लिहाजा पेरिस समझौते में बनी सहमति के अनुसार, वैश्विक तापमान को नियंत्रण में रखने के प्रयास बहुत जरूरी हो गए हैं।

ग्लोबल वॉर्मिंग पूरे विश्व के लिए समस्या
यहां पर बता दें कि वर्तमान में ग्लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है। इसका असर इंसानों पर ही नहीं, बल्कि धरती पर रहने वाले लगभग सभी जीवों पर पड़ रहा है। खासकर जलीय जीवों पर। इस वजह से कई मछलियों व कई जलीय जीवों की प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। वैज्ञानिक इसे भविष्य के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग से न केवल पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि मछलियों की संख्या घटने से मछुआरों की आमदनी पर भी असर पड़ रहा है। इस चिंताजनक स्थिति से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने कुछ जरूरी जानकारियां उपलब्ध कराई हैं। एक अध्ययन के आधार पर उन्होंने सुझाव दिया है कि यदि मछलियों को मरने से बचाना है तो पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्य को हासिल करना जरूरी है। इसी से मछुआरों की आमदनी को कम होने से बचाया जा सकता है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, ग्लोबल वॉर्मिंग पर पेरिस समझौते के तहत निर्धारित लक्ष्य को हासिल कर विश्व में लाखों टन मछलियों को बचाया जा सकता है। साथ ही अरबों रुपये के कारोबार पर पड़ने वाली बाधा को भी रोका जा सकता है।

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