भात पूजा मंगल दोषों का निवारण करती है

सौर मंडल में स्थित नवग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, अपने क्रम और अपनी गति से ये ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं लेकिन इन ग्रहों में एक ग्रह बेहद ख़ास है, जिसे लाल ग्रह के नाम से भी जाना जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं में भी इन्हें मंगलदेव कहा जाता है। ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यता में इन्हें भूमिपुत्र भगवान मंगलदेव कहा जाता है। मावना जाता है कि इनकी उत्पत्ति धरती से ही हुई है।

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धार्मिक रीति से भगवान मंगल के लिए कहा गया है –

धरणीगर्भ संभुतम्, विद्युतकांति समप्रभम्।

कुमारं शक्ति हस्तम् च मंगलम् प्रणमाम्यहम्।।

इस मंत्र को भगवान मंगलनाथ को प्रसन्न करने के लिए भी उच्चारित किया जाता है। इसमें भगवान की आराधना की गई है कि भगवान धरती के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, उनकी कांति विद्युत की तरह है, उनमें कुमार शक्ति अर्थात यौवन की स्फूर्ति है, उन्हें हम प्रणाम करते हैं। ज्योतिष में जातक की जन्म कुंडली देखने का विधान होता है। इस जन्मकंडली में यदि मांगलिक या अंगारक प्रभाव होता है तो जातक का भाग्योदय देरी से होता है, जातक का विवाह देरी से होता है और उसे कुछ नियत समय तक कैरियर के क्षेत्र में कड़ी मेहनत भी करनी पड़ती है। वैवाहिक दशा में माना जाता है कि मंगल का प्रभाव होने पर वर और वधू दोनों की कुंडली में मंगल दोष होना चाहिए। तभी विवाह उपयुक्त और मेल वाला माना जाता है। मांगलिक स्थिति का विचार किए बिना विवाह करना कई बार शुभकारक नही होता।

कब होता है मंगल दोष

ज्योतिषीय मान्यता है कि जातक की कुंडली के पहले, चैथे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव में मंगल दर्शाने पर लड़की या लड़का मांगलिक होते हैं। ऐसी दशा में मंगल दोष का निवारण करना पड़ता है। मान्यता के अनुसार मध्यप्रदेश का उज्जैन ऐसा एकमात्र स्थान है जहां मंगल दोष निवारण के लिए भात पूजन का विधान दिया गया है। हालांकि इसे दोष कहा जाता है मगर यह दोष नहीं होता है। मंगल की उत्पत्ति कारक स्थल के तौर पर भी यहां शिवलिंग का पूजन होता है। भगवान मंगलनाथ को कुमकुम, लालगुलाब और भातपूजन से प्रसन्न किया जाता है।

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