बाजार को रघुराम राजन का तोहफा – सीता

raghuram-rajan-rbi_30_09_2015तो आखिरकार भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर रघुराम राजन ने पॉलिसी रेट कट की वह घोषणा कर ही दी। इस घोषणा का एक लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था। और इसी के साथ उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की उम्मीदों को परवान चढ़ा दिया। अधिकांश लोग उम्मीद कर रहे थे कि अगर राजन राजी हुए तो भी हद से हद 25 बेसिस प्वॉइंट कट की ही घोषणा करेंगे। लेकिन 50 बेसिस प्वॉइंट कट की घोषणा करके तो उन्होंने सभी को चौंका दिया है।

वैसे राजन पर पिछले कुछ समय से वित्त मंत्रालय, उद्योग क्षेत्र और अनेक आर्थिक विश्लेषकों द्वारा रेट कट की घोषणा करने का दबाव लगातार बनाया जा रहा था। लेकिन जैसा कि उन्होंने पत्रकार वार्ता में बड़े ही नाटकीय अंदाज में कहा, ‘माय नेम इज रघुराम राजन और मैं वही करता हूं, जो मुझे करना है”, वास्तव में उन्होंने तमाम दबावों के बावजूद यह घोषणा तभी की, जब उन्हें लगा कि अब इसका सही समय आ गया है। राजन मुद्रास्फीति को लेकर चिंतित बने हुए थे और इसीलिए एक लंबे समय से अपने इस निर्णय को स्थगित कर रहे थे। लेकिन अब जब वे भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर किंचित आशान्वित हो गए हैं तो उन्होंने रेट कट की घोषणा कर दी है। इसी के साथ उन्होंने देश में पनप रही आर्थिक विकास की प्रवृत्तियों को भी आरबीआई की तरफ से हरी झंडी दिखाने का काम किया है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली से हाल के दिनों में जब भी अर्थव्यवस्था की स्थिति के बारे में पूछा जाता था, वे तुरंत ब्याज दरों का हवाला देते हुए इसकी जिम्मेदारी रिजर्व बैंक के हवाले कर देते थे। वे कहते थे कि जब तक आरबीआई द्वारा रेट कट की घोषणा नहीं की जाती, तब तक बाजार के सेंटीमेंट्स में भला कैसे सुधार लाया जा सकता है। लेकिन अब राजन ने गेंद को फिर से वित्त मंत्रालय के पाले में फेंक दिया है। उम्मीद से ज्यादा रेट कट करके उन्होंने वित्त मंत्रालय के सामने अब कोई विकल्प भी नहीं रख छोड़ा है। क्योंकि चाहे जो कहा जाता रहे, आखिर आरबीआई का रेट कट कोई जादू की छड़ी तो होता नहीं है, जो कि रातोंरात अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार ला सकता हो। आरबीआई ने भले अपना काम कर दिया, अब वित्त मंत्रालय को भी जरूरी कदम उठाने होंगे।

ऐसे में जेटली के सामने क्या विकल्प हैं?

सबसे पहली बात, अब जेटली को किसी भी सूरत में संरचनागत सुधारों को आगे बढ़ाना होगा। यह उनके लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि तीन प्रमुख संरचनागत सुधारों – भूमि अधिग्रहण, श्रम कानूनों में सुधार और जीएसटी – के लिए विधायी कदम उठाने जरूरी हैं और राज्यसभा में सरकार की गाड़ी अटकी हुई है। जेटली के लिए यह एक बड़ी चुनौती साबित होगा, क्योंकि कांग्रेस तो किसी भी स्थिति में सरकार का सहयोग करने से रही। हो सकता है, कांग्रेस जीएसटी पर सरकार का सहयोग करने को राजी हो जाए, लेकिन इस कर प्रणाली के रोलआउट में पहले ही खासी देरी हो चुकी है। सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए रचनात्मक उपाय सोचना होंगे। मिसाल के तौर पर राज्य सरकारों को उनके स्वयं के भूमि अधिग्रहण और श्रम सुधार कानूनों को पास करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। इसके अलावा बैंक्रप्सी कोड जैसे सुधारों के लिए विधायी सर्वसम्मति की आवश्यकता नहीं है और केंद्र सरकार को इसमें देर नहीं करनी चाहिए।

हो सकता है महंगाई की दर अभी नियंत्रित हो और आने वाले कुछ समय तक नियंत्रित ही बनी रहे, जिसके मद्देनजर आरबीआई ने रेट कट का निर्णय लिया है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सरकार इस मोर्चे पर पूरी तरह से निश्चिंत हो जाए। यह सच है कि आज भारत में अगर मुद्रास्फीति नियंत्रित है तो इसके लिए सबसे ज्यादा वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार ने कुछ भी नहीं किया है। खाद्य पदार्थों की महंगाई पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने भी यथासंभव कोशिशें की हैं और आरबीआई ने अपनी मौद्रिक नीति रिपोर्ट में इसे स्वीकार किया है। अब जरूरत है कि सरकार लोकलुभावन राजनीति के तकाजों के सामने घुटने न टेके और अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर कायम रहे।

दूसरा, सरकार के लिए बेहद जरूरी है कि निवेश की प्रक्रिया फिर से जोर पकड़े। पूंजीगत व्ययों को बढ़ावा देना इसका एक तरीका है। सरकार का यह निर्णय निजी क्षेत्र के निवेशों के लिए चुंबक का काम करेगा। आंकड़े तो यही बताते हैं कि पिछले साल की तुलना में इस साल पूंजीगत व्यय अधिक ही है, फिर भी सरकार को इस मोर्चे पर अधिक आक्रामक रुख अख्तियार करने की जरूरत है। हालांकि इससे उसके सामने एक दुविधा की स्थिति निर्मित हो सकती है। दुविधा यह कि शासकीय व्ययों में इजाफा करते हुए वित्तीय घाटे को कैसे नियंत्रित रखा जाए। आखिर राजन ने स्पष्ट संकेत दिया है कि आरबीआई अपने भविष्य के निर्णयों से पूर्व वित्तीय सुदृढ़ीकरण को निश्चित ही ध्यान में रखेगा। इससे बचने का एक तरीका यह हो सकता है कि सरकार खुद अपने खर्चे बढ़ाने के बजाय राज्य सरकारों को पूंजीगत व्ययों के लिए प्रेरित करे, ताकि चौदहवें वित्त आयोग ने सरकार को जो गुंजाइशें दी हैं, उनका वह अपने हित में बखूबी इस्तेमाल कर सके।

आरबीआई ने अपनी मौद्रिक नीति की रपट में इस तथ्य की ओर संकेत किया है कि नई निवेश परियोजनाएं नहीं आ रही हैं और कैपिटल गुड्स सेक्टर में जो बढ़ोतरी नजर आ रही है, वह केवल स्थगित परियोजनाओं को फिर से प्रारंभ करने के कारण है। जाहिर है, प्रधानमंत्री की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी भारत में व्यापार करना बहुत सहज-सुगम नहीं बन पाया है। इस दिशा में सुधार के लिए सरकार को हरसंभव प्रयास करना होंगे और राज्य सरकारों को भी इसके लिए प्रेरित करना होगा, क्योंकि अनेक नियामक बाधाएं राज्यों के दायरे में आती हैं। तीसरा, मौद्रिक नीति रपट में बिजली वितरण कंपनियों की बदहाली की तरफ भी संकेत किया गया है। उद्योग क्षेत्र के लिए बिजली की निर्बाध आपूर्ति अत्यंत आवश्यक है।

निश्चित ही, आर्थिक विकास अकेले केंद्र सरकार और आरबीआई की जिम्मेदारी नहीं होता, भारत जैसी संघीय व्यवस्था में राज्य सरकारों द्वारा भी इसमें बराबर की सहभागिता की जाना जरूरी है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि अब आरबीआई से छूटने के बाद वित्त मंत्रालय राज्य सरकारों के माथे ठीकरा फोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकता। विपक्ष भी अपनी राजनीति करता रहेगा, लेकिन उन्हें और प्रधानमंत्री को देश को विकास की राह पर ले जाने का कोई न कोई कारण तलाशना ही होगा। देश ने आर्थिक विकास के लिए ही मोदी सरकार को भारी बहुमत दिया था और अगर वह ऐसा कर पाने में नाकाम रही, तो उसके लिए भी दोष भी आरबीआई या विपक्ष के बजाय उसे ही दिया जाएगा।

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