देश का दूसरा डाउन सिंड्रोम बच्चा भी भोपाल से गोद गया

भोपाल.33 साल के हिमांशु कक्तवान दिल्ली में साॅफ्टवेयर इंजीनियर हैं। पांच साल पहले उनकी शादी प्री स्कूल टीचर कविता से हुई। दोनों ही उत्तराखंड में पौढ़ी गढ़वाल के हैं। शादी के पहले ही हिमांशु ने कविता को अपना इरादा बता दिया था कि वे अपना पहला बच्चा गोद लेना चाहेंगे। कविता ने इसे खुशी से स्वीकार किया। आज दोनों देश के पहले युगल हैं, जिन्होंने एक डाउन सिंड्रोम बच्ची को गोद लिया है।

राजधानी में ‘किलकारी’ से मिली दस महीने की इस बच्ची का नाम उन्होंने वेदा रखा है। पिछले हफ्ते सारी खानापूर्ति के बाद गोद में जब बच्ची आई तो कविता के साथ हिमांशु की आंखें भी नम थीं। वे बोले- हम हैरत में हैं कि रजिस्ट्रेशन के डेढ़ महीने के भीतर बच्ची हमारी गोद में है।
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शुरुआत में दोनों के परिजनों को बच्चा गोद लेने का ख्याल ही अटपटा लगा मगर हिमांशु ने राजी कर ही लिया। कविता तो सुनकर ही खुश हो गईं थीं। जनवरी 2016 में हिमांशु अमेरिका के शिकागो में थे, जब पुणे के सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित्य तिवारी की खबर पर उनकी नजर में आई। आदित्य देश के पहले सिंगल पेरेंट थे, जिन्होंने महीनों के संघर्ष के बाद एक डाउन सिंड्रोम बच्चे को गोद लिया था। इस खबर ने हिमांशु-कविता का इरादा बदल दिया। अब दोनों ने तय किया कि एक डाउन सिंड्रोम बच्ची ही चाहेंगे। दोनों ने अप्रैल 2017 को कारा की वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन कराया। वे दो साल उम्र तक की कोई बच्ची ही चाहते थे। उनकी यह खोज भोपाल में पूरी हुई। एक बच्ची यहां थी। कारा के मुताबिक यह डाउनसिंड्रोम बच्चे का दूसरा एडाप्शन है। पहला कपल है, जिसने इसे चुना।
परवरिश में कमी न हो इसके लिए स्कूल की नौकरी छोड़ी
मैंने प्री स्कूल टीचिंग के समय ऐसे बच्चों को करीब से देखा था। वे बोल नहीं पाते। देर से समझते हैं। उनके मन को पढ़ना बहुत ही कठिन। फिर प्रतिस्पर्धा। ऐसे में सबसे ज्यादा लाचारी मां-बाप के चेहरों पर। ऐसे बच्चों की साज-संभाल कहीं भी अासान नहीं। हिमांशु ने जब पहला बच्चा गोद लेने का विचार रखा तो सबसे पहले मुझे अच्छा लगा। फिर जब तय किया कि डाउन सिंड्रोम बच्चा ही लेना है तब मुझे अपने स्कूल के वे बच्चे याद आए। हमने एक मिनट भी विचार नहीं किया, तलाश शुरू की। वेदा अब हमारा अंश है। वेदा की परवरिश में कोई कमी न रहे इसके लिए मैंने स्कूल की नौकरी फिलहाल छोड़ दी है। -कविता कक्तवान
छह माह की थी वेदा, जब वह कपड़े में लिपटी मिली
भोपाल रेलवे स्टेशन के पास जुलाई 2016 को यह बच्ची एक कपड़े में लिपटी मिली थी। तब बमुश्किल छह महीने की होगी। उपचार के दौरान पता चला कि वह डाउन सिंड्रोम है। ऐसे बच्चों का एडाप्शन आसान नहीं होता। ‘किलकारी’ के अनुरोध पर इस बच्ची के लिए भारतीय अभिभावकों की तलाश छह माह तक जारी रही। हिमांशु-कविता ने गत माह इसे देखा और सिर्फ 40 दिन में उनकी गोद में बच्ची की किलकारी गूंजी।
डाउन सिंड्रोम की वजह से बच्ची का पुनर्वास लंबित था। अचानक ईश्वरीय सौगात सी प्यारी इस बच्ची को एक सक्षम परिवार मिल गया। यह पहल अन्य पेरेंट्स के लिए भी एक अनुकरणीय मिसाल है। -अपूर्वा शर्मा, डायरेक्टर, किलकारी उड़ान, सेंट्रल एडॉप्शन एजेंसी





