दाह संस्कार से जुड़ी ऐसी बातें जानकर आपके उड़ जाएंगे होश…

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भारतीय संस्कृति की कई ऐसी रस्में हैं जिनके बारे में शायद ही हम जानते हैं। हालांकि जीवन में ऐसे कई मोड़ आते हैं जब इन्हें करने और समझने का मौका हमें मिलता है। दाह संस्कार के समय की गई रस्में भी कुछ इसी प्रकार की हैं, जिन्हें हम अपने परिवार के किसी सदस्य के जाने वक्त ही जान पाते हैं। हालांकि कई लोग इन्हें दकियानूसी भी मानते हैं, मगर हमारे संस्कारों में निहित ये सभी नियम जितने शास्त्र सम्मत हैं, उतने ही वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरे उतरते हैं।दाह संस्कार से जुड़ी ऐसी बातें जानकर आपके उड़ जाएंगे होश...

दाह संस्कार के नियम

हिंदू धर्म में मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर को शीघ्र जलाने का नियम है। ऐसी मान्यता है कि इस तरह शरीर का कण-कण प्रकृति में विलीन हो जाता है। जिससे कई सूक्ष्म जीव भी मृत शरीर में प्रवेश करने से बच जाते हैं और आसपास किसी प्रकार का इंफेक्शन या रोग नहीं फैलता है। इस कारण से ऐसे जीवों के समूल नाश के लिए पार्थिव शरीर को जलाने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। जिसके बाद बची हुई राख गंगा या किसी पवित्र नदी में बहाने से मृत व्यक्ति के पाप धुलते हैं। ऐसे गरुड़ पुराण के अनुसार, आत्मा को शांति मिलती है और अगले जन्म में प्रवेश के द्वार खुलते हैं।

इस दिशा में क्यों रखते सिर

हमेशा पार्थिव शरीर का सिर चिता पर दक्षिण दिशा की ओर रखते हैं। दरअसल शास्त्रों के अनुसार, मरणासन्न व्यक्ति का सिर उत्तर की ओर और मृत्यु पश्चात दाह संस्कार के समय उसका सिर दक्षिण की तरफ रखना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति के प्राण निकलने में कष्ट हो तो मस्तिष्क को उत्तर दिशा की ओर रखने से गुरुत्वाकर्षण के कारण प्राण शीघ्र और कम कष्ट से निकलते हैं। वहीं मृत्यु पश्चात दक्षिण की ओर सिर रखने का कारण है कि शास्त्रानुसार, दक्षिण दिशा मृत्यु के देवता यमराज की है। ऐसे हम पार्थिव शरीर को मृत्यु देवता को समर्पित करते हैं।

इसलिए नहीं करते सूर्यास्त के बाद संस्कार

किसी व्यक्ति को मृत्यु किस घड़ी आएगी यह कोई नहीं जानता, मगर हमेशा सूर्यास्त के बाद कभी भी दाह संस्कार नहीं किया जाता है। इस वजह से अगर किसी की मृत्यु सूर्यास्त के बाद हुई है तो उसे अगले दिन सुबह के समय ही जलाने का नियम है। ऐसी मान्यता है कि सूर्य़ास्त के बाद दाह संस्कार करने से मृतक की आत्मा को परलोक में भारी कष्ट सहना पड़ता है और अगले जन्म में उसे किसी अंग में दोष भी हो सकता है।

क्यों होती पार्थिव शरीर की परिक्रमा

दाह संस्कार के समय प्रायः आप देखते हैं कि संस्कार करनेवाला व्यक्ति छेदवाले घड़े में जल लेकर चिता पर रखे पार्थिव शरीर की परिक्रमा करता है। जिसके अंत में पीछे की ओर घड़े को गिराकर फोड़ दिया जाता है। ऐसा मृत व्यक्ति के शरीर से मोहभंग करने के लिए किया जाता है। हालांकि इसके पीछे दार्शनिक रहस्य भी छिपा हुआ है। दरअसल इसका एक अर्थ यह भी है कि हमारा जीवन उस छेद रूपी घड़े के समान है, जिसमें आयु रूपी पानी हर पल गिरते हुए कम हो रहा है और जिसके अंत में सबकुछ छोड़कर जीवात्मा के परमात्मा में लीन होने का समय आ जाता है।

इसलिए किया जाता है पिंडदान

दाह संस्कार के समय मृत व्यक्ति के पुरुष परिजनों के सिर मुंडाने की प्रथा चली आ रही है। इस तरह मृत व्यक्ति के प्रति अपना श्रद्धा-सम्मान व्यक्त करने के साथ ही यह इस बात का भी द्योतक है कि अब उनके ऊपर मृत व्यक्ति से जुड़ी सारी जिम्मेदारियां आ गई हैं। इसके अलावा दाह संस्कार के बाद तेरह दिनों तक व्यक्ति का पिंडदान करते हैं। ऐसे उनकी आत्मा को शांति मिलती है और मृत शरीर और परिवार के बीच मोहभंग होता है। ऐसी भी हिंदू धर्म में मृत्यु को शोक न मानकर मोक्ष-प्राप्ति की संज्ञा दी जाती है। इसलिए जिसे पूरा जीवन व्यतीत करने के बाद मृत्यु आती है, उन्हें मुक्ति-प्राप्ति हुई कहा जाता है।

क्यों देते हैं मृत्यु भोज

भारतीय वैदिक परंपरा के सोलह संस्कारों में दाह संस्कार सबसे अंतिम है। इसके अंतर्गत कपाल क्रिया, पिंडदान के अलावा घर की साफ-सफाई भी शामिल है। इन्हें दशगात्र के नाम से पुकारा जाता है। जिसमें एकादशगात्र को पीपल वृक्ष के नीचे पूजन, पिंडदान आदि होता है। द्वादसगात्र में गंगाजल से घर पवित्र किया जाता है। फिर त्रयोदशी को ब्राह्मणों के भोज पश्चात रिश्तेदारों और समाज के करीबी लोगों को सामूहिक भोज दिया जाता है। ऐसे सूतक काल खत्म होने के बाद मृतक के परिवार में लोगों का आना-जाना सामान्य रूप से शुरू हो पाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, इस समय परिचित व रिश्तेदारों को मृतक के घर पर अनाज, ऋतु फल, वस्त्र व अन्य सामग्री लेकर जाना चाहिए। ऐसे मृतक के परिवार के साथ रहकर, साथ में सादा भोजन पकाने-खाने से उनका दुख कुछ कम होता है, मृत व्यक्ति के प्रति ढाढस बंधता है।

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