ज्ञान गंगा : गौहत्‍या पर ब्राह्मण ने मानी गलती

cow_27_09_2015क ब्राह्मण ने अपनी झोपड़ी के आसपास सुंदर बगीचा लगाया। एक दिन एक गाय बगीचे में घुस आई और जो कुछ भी बड़े परिश्रम से लगाया गया था, उसे चर गई। ब्राह्मण ने यह देखा तो क्रोध में आकर डंडे से गाय पर जोरदार प्रहार किया। गाय कमजोर थी और डंडा पड़ते ही वहीं मर गई। अब ब्राह्मण बेहद परेशान कि गौ-हत्या का पाप लग गया। इतने में गौ-हत्या स्वयं आकर खड़ी हो गई कि चलिए, अब अपने किए का दंड भुगतिए।

ब्राह्मण को युक्ति सूझी। उसने कहा – ‘इसमें मेरा कोई दोष नहीं। जो किया, हाथों ने किया। हाथों के देवता तो इंद्र हैं, अत: उनसे जाकर पूछो कि यह कैसे हो गया?” गौ-हत्या सीधी इंद्रदेव के पास जा पहुंची। बोली कि ब्राह्मण कहता है कि गाय की हत्या तो आपके द्वारा हुई है। हाथों के देवता होने के कारण उसने हत्या का आरोप आप पर डाला है। यह सुनकर इंद्र सोचने लगे कि बुरा काम कोई और करे और दोष किसी और का माना जाए। उन्होंने एक पंडित का वेश धारण किया और ब्राह्मण की झोपड़ी तक जा पहुंचे।

उन्होंने ब्राह्मण से कहा – ‘आपका बगीचा तो बड़ा सुंदर है। इसे किसने लगाया?” ब्राह्मण बोला – ‘मैंने लगाया है, स्वयं इन्हीं हाथों से।” इंद्र बोले – ‘ऐसा लगता है कोई जीव आकर इसका एक हिस्सा चर गया।” ब्राह्मण बोला – ‘हां, एक दुष्ट गाय आई थी। पर हमने उसे इतनी जोर से मारा कि वह वहीं मर गई।” इंद्र बोले – ‘तो क्या आपने गौ-हत्या की?”

ब्राह्मण ने पुन: दांव पलटा – ‘नहीं, हमने क्यों? हाथ तो इंद्र का अधिकार-क्षेत्र है। उन्हीं के द्वारा हुई।” इंद्र बोले – ‘वाह ब्राह्मणदेव, अपने हाथों द्वारा लगाए गए बगीचे का श्रेय तो आप स्वंय लेते हैं। तब आपको इंद्र का अधिकार-क्षेत्र याद नहीं आया। लेकिन जब हत्या की बात आई, तो आप कहने लगे कि इंद्र ने की है।” यह कहकर इंद्र ने स्वयं को प्रकट कर दिया। ब्राह्मण ने अपनी गलती मानी और गौ-हत्या का दंड भुगतने के लिए तैयार हो गया।

हर मनुष्य में एक सहज दोष होता है कि वह हर अच्छे कर्म का श्रेय खुद लेने की कोशिश करता है और बुरे कर्म का भार किसी और पर डालता है। यदि हम अच्छे कार्यों के लिए भी ईश्वरीय सत्ता की प्रेरणा को श्रेय दें तो हमारे अंदर अभिमान पैदा नहीं होगा, कर्म के प्रति आसक्ति नहीं होगी।

 
 
 
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