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गुप्त नवरात्रि 13 जुलाई 2018: जानिए, साधना विधि और जप का सही तरीका

आषाढ़ मास का ‘गुप्त नवरात्रि पर्व’ इस बार 13 जुलाई से 21 जुलाई तक मनाया जाएगा। ये पर्व ऋतुओं के संधिकाल पर पड़ते हैं। संधिकाल को उपासना की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। वर्ष की उपासना के लिए नवरात्रि को ही माना गया है, जैसे कि ‘शरद् काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।’ किंतु उपासकों की इच्छा बढ़ी तो उन्होंने वर्ष चक्र में 2 नवरात्रि की व्यवस्था की। प्रथम संवत् प्रारंभ होते ही बसंत नवरात्रि व दूसरा शरद नवरात्रि, जो कि आपस में 6 माह के अंतराल पर आते हैं। अब भक्तों ने 2 गुप्त नवरात्रि की व्यवस्था की जिसमें कि आषाढ़ सुदी प्रतिपदा (एकम) से नवमी तक पहला गुप्त नवरात्र तथा पौष सुदी प्रतिप्रदा (एकम) से नवमी तक दूसरा गुप्त नवरात्र मनाया जाता है। ये दोनों नवरात्रि युक्त संगत है, क्योंकि ये दोनों नवरात्रि अयन के पूर्व संख्या संक्रांति के हैं।गुप्त नवरात्रि 13 जुलाई 2018: जानिए, साधना विधि और जप का सही तरीका

प्रातः और सायंकाल, ब्राह्ममुहूर्त्त एवं गोधूलि वेला दिन और रात्रि के सन्धिकाल हैं। इन्हें उपासना के लिए उपयुक्त माना गया है। इसी प्रकार ऋतु संधिकाल के नौ-नौ दिन दोनों नवरात्रों में विशिष्ट रूप से साधना-अनुष्ठानों के लिए महत्त्वपूर्ण माने गये हैं।

नवरात्रि साधना को दो भागें में बांटा जा सकता है…

1. एक उन दिनों की जानेवाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया।
2. दूसरे आहार-विहार संबंधित प्रतिबंधों की तपश्चर्या।

इन दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना संपन्न होती है।

जप संख्या के बारे में विधान

9 दिनों में 24 हजार गायत्री मंत्रों का जप पूरा होना चाहिए। कारण 24 हजार जप का लघु गायत्री अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन 27 माला जप करने से 9 दिन में 240 मालाएं अथवा 2400 मंत्र जप पूरा हो जाता है। मोटा अनुपात घंटे में 11- 11 माला का रहता है। इस प्रकार प्रायः दो से ढ़ाई घंटे इस जप में लग जाते हैं। चूंकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से 45 मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। इसलिए नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है।जिनसे यह साधना न बन पड़े, वे प्रतिदिन 12 माला करके 108 माला का अनुष्ठान कर सकते हैं।

उपासना विधि

उपासना की विधि सामान्य नियमों के अनुरूप ही है। स्नानादि से निवृत्त होकर आसन बिछाकर पूर्व को मुख करके बैठें। जिन्होंने कोई प्रतिमा या चित्र किसी स्थिर स्थान पर प्रतिष्ठित कर रखा हो वे दिशा का भेद छोड़कर उस प्रतिमा के सम्मुख ही बैठें। वरूण देव तथा अग्नि देव को साक्षी करने के लिए पास में जल पात्र रख लें और घृत का दीपक या अगरबत्ती जला लें सन्ध्यावन्दन करके, गायत्री माता का आह्वान करें। आह्वान मन्त्र जिन्हें याद न हो वे गायत्री शक्ति की मानसिक भावना करें। धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, फल, चन्दन, दूर्वा, सुपारी आदि पूजा की जो मांगलिक वस्तुएं उपलब्ध हों उनसे चित्र या प्रतिमा का पूजन कर लें। जो लोग निराकार को मानने वाले हों वे धूपबत्ती या दीपक की अग्नि को ही माता का प्रतीक मान कर उसे प्रणाम कर लें। अपने गायत्री गुरु का भी इस समय पूजन वंदन कर लेना चाहिए, यही शाप मोचन है।

इस तरह आत्म शुद्धि और देव पूजन के बाद जप आरंभ हो जाता है। जप के साथ-साथ सविता देवता के प्रकाश का अपने में प्रवेश होते पूर्ववत् अनुभव किया जाता है। सूर्य अर्घ्य आदि अन्य सब बातें उसी प्रकार चलती हैं, जैसी दैनिक साधना में। हर दिन जो आधा घंटा जप करना होता था, वह अलग से नहीं करना होता वरन् इन्हीं 27 मालाओं में सम्मिलित हो जाता है।

गायत्री मंत्र एवं भावार्थ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भावार्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को संमार्ग की ओर प्रेरित करें।

अनुष्ठान में पालन करने के लिए दो नियम अनिवार्य हैं…

1. इन 9 दिनों ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

2. दूसरा अनिवार्य नियम है उपवास, जिनके लिए संभव हो वे नौ दिन फल, दूध पर रहें। एक समय अन्नाहार, एक समय फलाहार, दो समय दूध और फल, एक समय आहार, एक समय फल दूध का आहार, केवल दूध का आहार इनमें से जो भी उपवास अपनी सामर्थ्यानुसार हो उसी के अनुसार साधना आरंभ कर देनी चाहिए। जिनसे इतना भी न बन पड़े वे अन्नाहार पर भी रह सकते हैं, पर नमक और शक्कर छोड़कर अस्वाद व्रत का पालन उन्हें भी करना चाहिए। भोजन में अनेक वस्तुएं न लेकर दो ही वस्तुएं ली जाएं। जैसे- रोटी, दाल। रोटी- शाक, चावल- दाल, दलिया, दही आदि।

अनुष्ठान में पालन करने के लिए तीन सामान्य नियम हैं…

1. कोमल शैया का त्याग
2. अपनी शारीरिक सेवाएं अपने हाथों करना
3. हिंसा द्रव्यों का त्याग (चमड़े के जूते , रेशम, कस्तूरी, मांस, अण्डा )।

अनुष्ठान के दिनों में मनोविकारों और चरित्र दोनों पर कठोर दृष्टि रखी जानी चाहिए। साथ ही फ्ने मन को भटकने न दें। झूठ, क्रोध, छल, कटुवचन , अशिष्ट आचरण, चोरी, चालाकी, जैसे आचरणों से बचा जाना चाहिए। ईर्ष्या, द्वेष, कामुकता, प्रतिशोध जैसी दुर्भावनाओं से मन को जितना बचाया जा सके उतना अच्छा है।

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