क्यों करना चाहिए दिवंगत परिजनों का श्राद्ध?

shraddh1-1443162754दिवंगत परिजनों का श्राद्ध क्यों किया जाता है? यह प्रश्न उतना ही पुराना है जितनी श्राद्ध परंपरा। इसके पक्ष-विपक्ष में अनेक तर्क दिए जाते हैं। कोई इस परंपरा को पूर्वजों को नमन करने का तरीका बताता है तो किसी के लिए यह एक अंधविश्वास है। वास्तव में श्राद्ध परंपरा का एक गूढ़ रहस्य है। यह अंधविश्वास नहीं है।

27 सितंबर 2015 (रविवार) से श्राद्ध शुरू हो रहे हैं। इस दिन पूर्णिमा श्राद्ध है। 12 अक्टूबर 2015 तक श्राद्ध चलेंगे। उस दिन सर्वपितृ अमावस्या होगी। श्रद्धा का दूसरा नाम है – श्राद्ध। यह संपूर्ण अवधि उन परिजनों और परिचितों के लिए होती है जो इस दुनिया में नहीं हैं।

हिंदू शास्त्र आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। मनुष्य जब तक इस धरती पर रहता है और जो भी कर्म करता है, उस दौरान उस पर माता-पिता, पूर्वजों और धरती सहित अनेक ऋण लागू होते हैं। वह पृथ्वी से अन्न, जल, धन आदि प्राप्त करता है और उससे जीवन ग्रहण कर एक दिन उसी में समा जाता है। शास्त्रों में मुख्यतः तीन ऋण बताए गए हैं – देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण।

 

मृत्यु जीवन का अंत नहीं होती। यह एक पड़ाव होती है। जब मनुष्य की मृत्यु हो जाती है और उसका शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है तो परलोक में उसे कर्मों का फल प्राप्त होता है। वहीं, जितने दिन उसने पृथ्वी पर गुजारे और वह यहां के पदार्थों का स्वामी बनकर रहा, वह धरती और यहां के प्राणियों का आभारी होता है, क्योंकि वह उनका भी ऋणी है।

इसलिए श्राद्ध के रूप में किसी को भोजना कराया जाता है, दान दिया जाता है और गाय को ग्रास देकर उसकी भी पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, इस विधि से परलोक गए पितृदेव प्रसन्न होते हैं क्योंकि उनकी संतति शुभ कर्मों में उनके द्वारा छोड़े गए पदार्थों का उपयोग करती है, किसी को भोजन खिलाती है और गौ की पूजा करती है। इस प्रकार श्राद्ध पुण्य और परोपकार का दूसरा नाम है। श्राद्ध के रूप में हम हर वर्ष उनका स्मरण करते हैं।

 

 

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