क्या आप जानते हैं डायबिटीज जैसा ही खतरनाक होता है अकेलापन…

- in हेल्थ

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी मतलब सोशल एनिमल है। यानी वो अकेले जिंदगी बसर नहीं कर सकता। लोगों से घुलना-मिलना, उनके साथ वक़्त बिताना, पार्टी करना और मिल-जुलकर जश्न मनाना हमारी फितरत भी है और जरूरत भी। इसके विपरीत, अगर कोई अकेला रहता है, लोगों से मिलता-जुलता नहीं, उसके साथ वक़्त बिताने वाले लोग नहीं हैं, तो इसे एक बड़ी परेशानी समझा जाता है।यही वजह है कि अकेलेपन को सजा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है। लोगों को जेलों में अकेले कैद करके रखा जाता है। दिमागी तौर पर बीमार लोगों को जंजीरों से बांधकर अकेले रखा जाता है।क्या आप जानते हैं डायबिटीज जैसा ही खतरनाक होता है अकेलापन...

अकेलापन इस कदर खतरनाक है कि आज तमाम देशों में अकेलेपन को बीमारी का दर्जा दिया जा रहा है। अकेलेपन से निपटने के लिए लोगों को मनोवैज्ञानिक मदद मुहैया कराई जा रही है। तो, क्या वाकई अकेलापन बहुत खतरनाक है और इससे हर कीमत पर बचना चाहिए? बहुत से लोग इसका जवाब ना में देना पसंद करते हैं। उन्हें पार्टियों में, किसी महफिल में या जश्न में शरीक होना हो, तो वो कतराने लगते हैं। महफिलों में जाना नहीं चाहते। लोगों से मिलने-जुलने से बचते हैं।

 

ऐसे बहुत से लोग हैं जो आज अकेले रहने की वकालत करते हैं।अमरीकी लेखिका एनेली रुफस ने तो बाकायदा ‘पार्टी ऑफ वन: द लोनर्स मैनीफेस्टो’ के नाम से किताब लिख डाली है। वो कहती हैं कि अकेले रहने के बहुत से मजे हैं। आप ख़ुद पर फोकस कर पाते हैं। अपनी क्रिएटिविटी को बढ़ा पाते हैं। लोगों से मिलकर फिज़ूल बातें करने या झूठे हंसी-मजाक में शामिल होने से बेहतर अकेले वक़्त बिताना।

वहीं ब्रिटिश रॉयल कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर्स कहता है कि अकेलापन डायबिटीज जैसी भयानक बीमारी है। इससे भी उतने ही लोगों की मौत होती है, जितनी डायबिटीज की वजह से। अकेलापन हमारे सोचने-समझने की ताकत को कमजोर करता है। अकेला रहना हमारी अक़्लमंदी पर बुरा असर डालता है। बीमारियों से लड़ने की हमारी क्षमता कम होती है।
 

अकेले रहने से बढ़ती है क्रिएटिविटी

तन्हा रहना, पार्टियों से दूरी बनाना और मित्रों से मिलने में आना-कानी करना अगर ख़ुद का फ़ैसला है, तो ये काफ़ी फायदेमंद हो सकता है।अमरीका की सैन जोस यूनिवर्सिटी के ग्रेगरी फीस्ट ने इस बारे में रिसर्च की है। फीस्ट इस नतीजे पर पहुंचे कि ख़ुद के साथ वक़्त बिताने से आपकी क्रिएटिविटी को काफ़ी बूस्ट मिलता है। इससे आपकी ख़ुद-ऐतमादी यानी आत्मविश्वास बढ़ता है। आज़ाद सोच पैदा होती है। नए ख्यालात का आप खुलकर स्वागत करते हैं।

जब आप कुछ वक़्त अकेले बिताते हैं तो आपका जहन सुकून के पलों का बख़ूबी इस्तेमाल करता है। शोर-शराबे से दूर तन्हा बैठे हुए आपका जहन आपकी सोचने-समझने की ताकत को मजबूत करता है। आप पुरानी बातों के बारे में सोचकर अपनी याददाश्त मजबूत करते हैं।

अमरीका की ही बफ़ैलो यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक जूली बोकर के रिसर्च से फ़ीस्ट के दावे को मजबूती मिली है। जूली कहती हैं कि इंसान तीन वजहों से लोगों से घुलने-मिलने से बचते हैं। कुछ लोग शर्मीले होते हैं इसलिए दूसरों से मिलने-जुलने से बचते हैं। वहीं कुछ लोगों को महफ़िलों में जाना पसंद नहीं होता। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो मिलनसार होने के बावजूद अकेले वक़्त बिताना पसंद करते हैं।

जूली और उनकी टीम ने रिसर्च में पाया कि जो लोग ख़ुद से अकेले रहना पसंद करते हैं, उनकी क्रिएटिविटी बेहतर होती जाती है। अकेले रहने पर वो अपने काम पर ज़्यादा ध्यान दे पाते हैं। अपनी बेहतरी पर फोकस कर पाते हैं। नतीजा उनकी क्रिएटिविटी बढ़ जाती है।

धर्मों में अकेले तप, चिंतन-मनन की सलाह

वैसे, अकेलेपन के फायदे बताने वाले ये मनोवैज्ञानिक कोई नई चीज नहीं बता रहे हैं। हिंदू धर्म से लेकर बौद्ध धर्म तक, बहुत से मजहब हैं जो अकेले तप करने और चिंतन-मनन करने की सलाह देते हैं।असल में अकेले रहने पर हमारा दिमाग आराम की मुद्रा में आ जाता है। वो आरामतलबी के इस दौर में याददाश्त को मजबूत करने और जज़्बात को बेहतर समझने में जुट जाता है।वहीं आप किसी के साथ होते हैं, तो आपका ध्यान बंटता है। आपके जहन को सुकून नहीं मिल पाता।

ग्रेगरी फ़ीस्ट कहते हैं कि लोग अगर ख़ुद से अकेले रहना, तन्हाई में वक़्त बिताना पसंद करते हैं। तो ये उनके लिए ज़्यादा फायदेमंद है। लेकिन महफ़िलों के आदी लोग अकेलेपन के शिकार हों, ये परेशानी की बात है।अच्छा हो कि हम गिने-चुने दोस्त ही बनाएं। उनके साथ ही क्वालिटी टाइम बिताएं। बनिस्बत इसके कि हम रोजाना पार्टियां करें, महफ़िलें सजाएं। बीच-बीच में थोड़ा वक़्त तन्हाई में बिताएं। ख़ुद पर फोकस करें। चिंतन-मनन करें। ये तालमेल बनाना हमारे लिए सबसे ज़्यादा अच्छा साबित होगा।

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