केवल कर्मकांड नहीं है श्राद्ध

naika_pitru-paksha_05_10_2015श्राद्ध के दौरान किया जाने वाला पितृयज्ञ भी केवल निभा दिए जाने के लिए एक कर्मकांड नहीं है। इसका मूलभूत उद्देश्य है कृतज्ञता ज्ञापन। जो पूर्वज हमारे बीच नहीं रहे उन्होंने अपने जीवनकाल में हमारे लिए जो कुछ भी किया, उसके लिए उनके प्रति हम इसी तरह कृतज्ञता ज्ञापित कर सकते हैं।

हमारी परंपरा से मिले सभी पर्वों और उनमें शामिल रीति-रिवाजों के मूल में कुछ न कुछ संदेश है। इसी तरह श्राद्ध के दौरान किया जाने वाला पितृयज्ञ भी केवल निभा दिए जाने के लिए एक कर्मकांड नहीं है। इसका मूलभूत उद्देश्य है कृतज्ञता ज्ञापन। जो पूर्वज हमारे बीच नहीं रहे उन्होंने अपने जीवनकाल में हमारे लिए जो कुछ भी किया, उसके लिए उनके प्रति हम इसी तरह कृतज्ञता ज्ञापित कर सकते हैं। कृतज्ञता इस बात के लिए कि आज हमारे पास जो कुछ भी है, वह हमारे पूर्वजों की ही देन है।

भले उनके अवदान के रूप में धन-संपदा किसी के पास न हो, लेकिन वह व्यक्तित्व जिसके माध्यम से वह समाज में अपना स्थान बनाए हुए है, उसके पूर्वजों की ही देन है। हमारे यहां आत्मा को अजर-अमर माना गया है।

इसलिए हम अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करते हुए उनकी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं और इसी क्रम में श्रद्धापूर्वक कुछ दान कर देते हैं। दान यही मानकर किया जाता है कि यह हमारी वर्तमान उपलब्धियों में हमारे पूर्वजों का भाग है। यह कृतज्ञता सिर्फ दिवंगत हुए लोगों के लिए ही नहीं है, यह उन सभी जीवित लोगों के प्रति भी है जिनके आशीर्वाद से हम इस जीवन में सुख की प्राप्ति करते हैं।

माता-पिता के चरणों में ही है स्वर्ग

निश्चित रूप से इसका वास्तविक संदेश यही है कि हमें अपने अस्तित्वमान बुजुर्गों- माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी आदि के प्रति भी हमेशा कृतज्ञ होना चाहिए और अपनी यह कृतज्ञता की भावना हमें उनके समक्ष ज्ञापित भी करना चाहिए।

जीवित माता-पिता के प्रति ज्ञापित करने के लिए किसी कर्मकांड की आवश्यकता भी नहीं है। उनका ध्यान रखना ही काफी होगा। जो माता-पिता की उपेक्षा करते हैं, वे कभी मातृ-पितृ ऋण से उऋण नहीं हो सकते। पाप के भागीदार होते हैं। माता-पिता उचित देख-रेख, सेवा-सद्व्यवहार से ही प्रसन्न होते हैं।

उनके आशीर्वाद से समस्त प्रतिकूल ग्रह एवं विपरीत समय अनुकूल हो जाता है। यह व्यक्ति के भाग्योदय में सहायक होता है। ठीक इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति का आचरण माता-पिता के प्रति उपेक्षा का है, वह उन्हें कष्ट देता है तो उसके अनुकूल ग्रह भी प्रतिकूल प्रभाव देने लगते हैं।

वृद्ध माता-पिता को सेवा एवं सुरक्षा की जरूरत होती है। किसी भी प्रकार की पूजा या कर्मकांड से श्रेष्ठ फल माता-पिता की सेवा से प्राप्त होता है। माता पार्वती एवं पिता श्री महादेवजी की विघ्न विनायक श्री गणेशजी तीन परिक्रमा करके अग्र पूजनीय हो गए। माता-पिता की सेवा ही सर्वश्रेष्ठ पूजा, समस्त तीर्थ तथा समस्त प्रकार के पुण्यों से बड़ा पुण्य होता है और इनकी उपेक्षा ही सबसे बड़ा पाप है।

कहा जाता है कि सच्ची भावना के बिना भगवान की पूजा भी फलदायी नहीं होती। भला किसी परंपरा की वास्तविक समझ और उसे व्यवहार में अपनाए बिना उसे लोकलाज या भयवश नाममात्र के लिए ढोने से वह कैसे फलदायी हो सकती है। पितृयज्ञ का लाभ मिले, इसके लिए आवश्यक है कि इसके मर्म को समझते हुए माता-पिता और अन्य बुजुर्गों की सेवा की जाए।

 
 
 
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