केरल के मशहूर ‘त्रिशूर पुरम’ उत्सव में होगी आतिशबाजी : ओमन चांडी

thrissur-pooram-650_650x400_61460632817-300x177एजेन्सी/ कोट्टयम (त्रिशूर) : कोल्लम मंदिर त्रासदी के बाद मशहूर ‘त्रिशूर पूरम’ उत्सव के आयोजन में अड़चनें पैदा करने के व्यापक आरोपों के बीच केरल सरकार ने कहा कि उत्सव के सुचारू संचालन के लिए सभी जरूर कदम उठाए जा रहे हैं। यह उत्सव ढोल-नगाड़ों के बीच हाथियों के भव्य जुलूस और खूब सारी आतिशबाजी के लिए जाना जाता है।

हाथियों का जुलूस और आतिशबाजी होती है मुख्य आकर्षण
राजधानी तिरुवनंतपुरम से करीब 270 किलोमीटर दूर आयोजित होने वाले त्रिसूर पुरम का रविवार को समापन होना है। इस इलाके के करीब दस मंदिरों का प्रबंधन हफ्ते भर चलने वाले इस उत्सव में हिस्सा लेते हैं। करीब सौ हाथियों के भव्य जुलूस के अलावा भव्य आतिशबाजी भी इस उत्सव का मुख्य आकर्षण होता है। हालांकि पुत्तिंगल मंदिर में हुए भयानक हादसे के बाद तेज आवाज वाले पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिए जाने के बाद इस उत्सव के आयोजन पर सवाल उठने लगा था।

उत्सव को लेकर राजनीति भी तेज
केरल में अगले महीने विधानसभा होने हैं और ऐसे में इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग लेना भी शुरू कर दिया है। केरल बीजेपी ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस नीत यूडीएफ सरकार मंदिर उत्सव के सलाना समारोह में विभिन्न पाबंदियां लगाकर मशहूर त्रिशूर पूरम को समाप्त करने का प्रयास कर रही है। बीजेपी के राज्य अध्यक्ष के राजशेखरन ने कहा कि त्रिशूर के आयोजन को सभी पूरम का पूरम (उत्सव) माना जाता है। इसमें न केवल शहर बल्कि समूचे केरल की संस्कृति एवं परंपराओं की झलक मिलती है। उन्होंने कहा कि यूनेस्को ने भी त्रिशूर पूरम को विश्व के सर्वोत्तम त्योहारों में से एक माना है।

सरकार लेगी अदालत की इजाजत
अब मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने कहा है, किसी तरह की प्रत्योगी आतिशबाजी की इजाजत नहीं दी जाएगी, लेकिन निर्धारित सीमा के अंदर पटाखे फोड़े जा सकते हैं। चाड़ी ने कहा, ‘हम सभी नियमों और सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए त्रिशूर पुरम का आयोजन पारंपरिक ढंग से किया जा सके यह सुनिश्चित करने के लिए हम हाईकोर्ट से इजाजत मागेंगे।’

हाथियों के जुलूस पर प्रतिबंध भी हटाया गया
इस बीच राज्य के वनमंत्री तिरुवनचूर राधाकृष्णन ने भी हाथियों के जुलूस पर प्रतिबंध लगाने के अपने विभाग के आदेश को वापस ले लिया है। हाथियों का जुलूस भी पूरम का मुख्य आकर्षण होता है। इस परंपरा को 200 वर्ष पहले कोच्चि राजवंश के मशहूर शासक संकतन थामपूरन ने शुरू किया था। वन विभग ने पूरम आयोजित करने वाले दो प्रमुख देवस्वान को नोटिस जारी कर हाथियों की नुमाइश पर प्रतिबंध लगा दिया था। आदेश में कहा गया कि दिन के समय किसी हाथी की परेड नहीं कराई जाएगी और जुलूस में हाथियों के बीच चार मीटर की दूरी रखी जाएगी।

गौरतलब है कि पुत्तिंगल मंदिर में आतिशबाजी की एक प्रतियोगिता के दौरान हुए हादसे में 113 लोगों की जान चली गई और 1,000 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इस हादसे के बाद केरल हाईकोर्ट ने सूरज ढलने के बाद आवाज करने वाले पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।

 
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