इस शख्स ने प्रबंधक की नौकरी छोड़कर शुरू की मशरूम की खेती और अब कमाता हैं…

परंपरागत खेती छोड़ यदि किसान व्यावसायिकता की ओर ध्यान दें तो प्रतिमाह लाखों रुपये कमा सकते हैं। ऐसे ही गांव मंझावली के प्रगतिशील किसान अमरेश यादव हैं, जिन्होंने करीब पांच साल पहले कंपनी प्रबंधक की नौकरी छोड़ बटन मशरूम की फसल लगाकर एक साल में ही लाखों रुपये का मुनाफा कमाया है। अब वह दूसरे किसानों को भी खेती करने के लिए प्रेरित ही नहीं कर रहे, बल्कि करीब 15 से 20 लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं। उनका दावा है कि फरीदाबाद में उनके जैसी जैविक फसल कहीं नहीं है। यहां 12 महीने मशरूम उपलब्ध है।

अमरेश यादव ने बताया कि कृषि सुधार कानून से किसान का दायरा काफी बढ़ गया है। अब तक उनकी फसल तीन प्रदेशों में जा रही है, लेकिन इस कानून के आने से वे देशभर में कहीं भी अपनी फसल को मनचाहे दाम पर बेच सकेंगे। अमरेश यादव बताते हैं कि उन्होंने एमबीए, एलएलबी की पढ़ाई की पूरी करने के बाद मुंबई की एक कंपनी में प्रबंधक के पद पर काम किया था। नौकरी के दौरान ही उन्हें रुड़की उत्तराखंड में रहने वाले एक किसान मित्र ने जैविक खेती की जानकारी दी।

अमरेश ने बताया कि अपने किसान मित्र से प्रेरित होकर ही उन्होंने करीब पांच साल पहले नौकरी छोड़ दो चैंबर से खेती शुरू की। एक चैंबर में करीब 2200 बैग लगते हैं। जिसके लिए करीब 100 रुपये किलो बीज की खरीद हुई। वर्तमान में उनके पास चार चैंबर है, जिसमें एक महीने में दो चैंबर से करीब आठ लाख रुपये की इनकम होती है। जिसमें खर्चा काटकर करीब चार लाख रुपये की बचत कर रहे हैं। यह कार्य उन्होंने बैंक ऋण से शुरू किया था।

मशरूम की फसल में है चुनौतियां
उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती श्रमिकों की है। किसान अमरेश ने बताया कि मशरूम की खेती के लिए श्रमिक मिल पाना मुश्किल है। मिलते भी हैं तो उनको काफी अधिक मेहनताना देना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ जब फसल आती है तो उसको रोक नहीं सकते, बाजार में पहुंचाना होता है। नहीं तो मशरूम खराब हो जाती है।

तापमान की होती है विशेष भूमिका
अमेरश ने बताया कि कोरोना काल से उसके फार्म से ही मशरूम की बिक्री में काफी इजाफा हुआ है। वहीं मशरूम की फसल के लिए तापमान विशेष मायने रखता है। मशरूम की खेती काफी महंगी होने के कारण प्रत्येक किसान की पकड़ से बाहर है। इसमें निरंतर किसान को मेहनत करनी होती है इसके अलावा बढ़ते-घटते बजट पर भी ध्यान रखना पड़ता है। जिसके चलते किसान बीच में ही खेती बंद कर देता है।

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