इस जगह में जन्म से लेकर मरने तक पीछा नहीं छोड़ती ये 3 चीजें

- in ज़रा-हटके

तीर से निशाने लगाए जाते हैं। उनसे युद्ध लड़े और जीते जाते हैं। मगर, आपको ये जानकर हैरानी होगी कि तीर से लॉटरी भी खेली जा सकती है। यकीन नहीं होता, तो चलिए हमारे साथ पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय की सैर पर…इस जगह में जन्म से लेकर मरने तक पीछा नहीं छोड़ती ये 3 चीजेंमेघालय यानी बादलों का घर। इसकी राजधानी है शिलॉन्ग। शिलॉन्ग के पुलिस बाजार से गुजरिए, तो सड़कों के किनारे तमाम छोटी-छोटी दुकानें दिखती हैं। इन दुकानों पर आपको कुछ ऐसी चीज बिकती दिखती है, जो लॉटरी का टिकट लगती है। इन दुकानों के सामने ब्लैकबोर्ड पर कुछ नंबर लिखे होते हैं। दुकानों के बाहर खड़े लोग बड़े उत्साह से इन नंबरों के बारे में चर्चा करते रहते हैं। फिर वो दुकान से पर्ची खरीदते हैं। उन पर्चियों पर ब्लैकबोर्ड में लिखे नंबर दर्ज होते हैं।

1 से लेकर 99 तक
तीर, शिलॉन्ग में रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है। मेघालय के लोगों का तीर से सदियों का नाता रहा है। कभी इसका इस्तेमाल दुश्मन को हराने और बाहरी हमलों से अपनी हिफाजत में किया जाता था। मगर, आज तीर से लॉटरी के नंबर का शिकार किया जाता है। इस दिलचस्प खेल या यूं कहें कि जुए में आप को एक से लेकर 99 तक किसी भी नंबर पर दांव यानी पैसा लगाना होता है। इसके बाद होता है तीर चलाने का मुकाबला। जितने तीर निशाने पर लगते हैं, उनकी संख्या अगर आपके लगाए दांव के नंबर से मिलती है, तो आपकी अच्छी कमाई हो जाती है। दांव खाली गया, तो अगली बार का इंतजार।

लॉटरी पर दांव
सुबह के वक्त आप इन दुकानों पर अपने दांव लगा सकते हैं। यानी लॉटरी खरीद सकते हैं। इसके बाद भीड़ चल पड़ती है शिलॉन्ग के पोलो मैदान की तरफ। अब इस मैदान का नाम खासी हिल्स आर्चरी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट हो गया है। यहां पर तीर कमान लिए करीब 50 धनुर्धर जमा हैं। घेरा बनाकर बैठे इन तीर-धनुष के उस्तादों में से ज्यादातर आप को पान चबाते हुए दिखेंगे, जिनके दांत लाल होंगे।

साथ ही भीड़ है तीर वाली लॉटरी पर दांव लगाने वालों की। रेफरी के इशारे पर मैदान में सन्नाटा पसर जाता है। इसके बाद हर धनुर्धर एक के बाद एक 30 तीर निशाने पर छोड़ता है। मौके पर मौजूद लोगों की आंखों के सामने तीरों की बौछार सी होती मालूम होती है।
गहरी हैं निशानेबाजी की जड़ें
मेघालय की खासी जनजाति के लिए तीर चलाना खेल भी रहा है और आत्मरक्षा का जरिया भी। ज्यादातर पूर्वोत्तर राज्यों की तरह मेघालय भी देश की मुख्यधारा से अलग-थलग जनजातीय जिंदगी जीता रहा था। आज भी मेघालय में राजधानी शिलॉन्ग के सिवा कोई बड़ा शहर नहीं है। यहां की जिंदगी अभी भी ग्रामीण और जंगली परिवेश वाली ही है।

लोगों के लिए तीर से निशाना साधना समय काटने का बड़ा जरिया रहा है। शिलॉन्ग की नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेसमंड खार्माफलांग कहते हैं, ‘तीर-धनुष से निशानेबाजी की जड़ें खासी समुदाय में काफी गहरी हैं। इससे कई किस्से-कहानियां मिथक भी जुड़े हुए हैं, जो आज भी सुने-सुनाए जाते हैं’।

डेसमंड खार्माफलांग के मुताबिक, धनुर्विद्या खासी लोगों को ऊपरवाले से तोहफे में मिली थी। मिथक कहता है कि खुद भगवान ने इसे स्थानीय देवी का शिनाम को सिखाया था। उस देवी का शिनाम ने फिर ये तीर कमान अपने बेटों यू शिना और यू बतितों को विरासत में सौंपी। इससे खेलते-खेलते दोनों बच्चे बहुत बड़े निशानेबाज बन गए।

ब्रिटिश सेना से मुकाबला
मेघालय के लोगों के बीच ये दैवीय कला आज भी खूब रचती-बसती है। डेसमंड खार्माफलांग बताते हैं कि मेघालय में आज भी जब कोई लड़का पैदा होता है, तो उसके बगल में तीन तीर और धनुष रखे जाते हैं। पहला तीर उसकी जमीन की निशानी होता है। तो, दूसरा तीर उसके खानदान की पहचान और तीसरा तीर खुद उसकी पहचान बनता है।

लोगों की मौत के बाद इस धनुष को उनके साथ रखा जाता है। ये तीर किसी भी लड़के के जन्म के बाद से सहेजकर रखे जाते हैं। मौत के बाद उन्हें आसमान की तरफ निशाना साधकर फेंका जाता है। इसका मतलब ये होता है कि ये तीर उस आदमी के साथ जन्नत तक जाएंगे। तीर से निशानेबाजी का हालिया इतिहास उन्नीसवीं सदी के आगाज से शुरू होता है।

अप्रैल, 1829 में स्थानीय योद्धा यू तिरोत सिग सिएम ने धनुर्धरों की सेना के साथ ब्रिटिश सेना का मुकाबला किया था। हालांकि इस जंग में वो अंग्रेजों से हार गए। मगर आज भी उनकी बहादुरी के किस्से चलन में हैं। यू तिरोत सिग सिएम को इस इलाके का सबसे बहादुर स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है।

लॉटरी: अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान
भारत के आजाद होने के बाद से मेघालय को देश की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें शुरू हुईं। तरक्की के साथ-साथ तीर-कमान का चलन कम हो गया। अब ये टाइमपास के तौर पर ही सीखा और इस्तेमाल किया जाता है।

हालांकि आज भी शिलॉन्ग और राज्य के दूसरे इलाकों में तीर-कमान से निशानेबाजी के बड़े मुकाबले आयोजित किए जाते हैं। अक्सर ऐसे आयोजन त्यौहारों पर होते हैं। इन्हें जीतना शान की बात मानी जाती है। दूर-दूर से तीरंदाज ऐसे मुकाबलों में हिस्सा लेने के लिए आते हैं। विजेताओं को इनाम में मोटी रकम मिलती है। कई बार तो बड़े कारोबारी घराने भी ऐसे आयोजनों के प्रायोजक बनते हैं।

वक्त के साथ तीरंदाजी में जुए के दांव भी शामिल हो गए। पहले मेघालय सरकार ने लॉटरी पर रोक लगा रखी थी, लेकिन आज इसका राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान माना जाता है। आज तीरंदाजी मेघालय की संस्कृति का अटूट हिस्सा बन गई है। स्थानीय सरकार के मुताबिक पूरे मेघालय में करीब पांच हजार सट्टेबाज हैं, जो तीरंदाजी के मुकाबले में सट्टा लगाते हैं। इनमे से 1500 तो अकेले शिलॉन्ग में सक्रिय हैं।

तीरंदाजी में सट्टा लगाने वाले को एक रुपए के बदले में 500 रुपए तक की कमाई हो सकती है। हारने पर नई बाजी का इंतजार किया जाता है। स्थानीय ट्रैवल ब्लॉगर अमृता दास यहीं पली-बढ़ी थीं। अब वो बाहर रहती हैं, लेकिन साल में तीन-चार बार अपने माता-पिता से मिलने आती हैं।

अमृता जब भी आती हैं, तो वो तीरंदाजी में सट्टा जरूर लगाती हैं। उन्हें ब्लैकबोर्ड पर लिखे नंबर बहुत लुभाते हैं। डेसमंड खार्माफलांग कहते हैं कि सट्टेबाजी की वजह से मेघालय की संस्कृति की अहम पहचान ये तीरंदाजी आज भी सुरक्षित है। अब तो राज्य की सरकार भी इसे बढ़ावा देने के लिए तमाम कदम उठा रही है। लोगों को सिखाने के लिए आर्चरी क्लब खोले गए हैं। अब तो खासी जनजाति के लोगों के अलावा दूसरे समुदायों के लोग भी तीरंदाजी सीख रहे हैं।

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