इन्हीं की देन है इंटरनेट की हाई स्पीड,जाने

l_Arogyaswami-Paulraj-1463892983भारतीय मूल के अमरीकी प्रोफेसर आरोग्यस्वामी पॉलराज स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी, कैलिफोर्निया में पढ़ाते हैं।  वायरलेस तकनीक में योगदान के लिए उन्हें हाल ही प्रतिष्ठित यूरोपियन इन्वेंटर अवॉर्ड से नवाजा गया है। यह आविष्कार जगत का सबसे बड़ा अवॉर्ड है। 72 वर्षीय पॉलराज को अपनी इस उत्कृष्ट तकनीक के लिए 2014 में मारकोनी अवॉर्ड (टेक्नोलॉजी का नोबेल) भी मिल चुका है। जानते हैं पॉलराज के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में-

तमिलनाडु के कोयम्बटूर में 14 अप्रेल, 1944 को जन्मे आरोग्यस्वामी जोसेफ पॉलराज को हाई-स्पीड इंटरनेट का पिता भी कहा जाता है। छह भाई-बहनों में से एक आरोग्यस्वामी ने 15 साल की उम्र में ही स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली और भारतीय नौसेना की इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग ब्रांच से जुड़ गए। यहां उन्हें हथियारों के नियंत्रण  का काम मिला, लेकिन वे कुछ नया करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने नियंत्रण तकनीक, संचार और सिग्नल सिस्टम के क्षेत्र में आगे की पढ़ाई की। उनके काम से खुश होकर वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें 1969 में पढऩे के लिए आईआईटी दिल्ली भेज दिया। यहां पॉलराज का बेहतर प्रदर्शन देखकर आईआईटी दिल्ली के ही एक प्रोफेसर पीवी इंद्रसेन ने नौसेना से पॉलराज को पीएचडी कराने के लिए मना लिया। आगे पढऩे के इस मौके से उनके जीवन को नई दिशा मिली।

भारतीय सेना ने दिया अति विशिष्ट सम्मान

 भारत में तीन राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स (सीएआईआर), सेंटर फॉर डवलपमेंट ऑफ एडवांस कम्प्यूटिंग (सीडैक) व सेंटर रिसर्च लैब्स ऑफ भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (सीआरएल) की स्थापना की। 2010 में पद्मभूषण पुरस्कार से हुए सम्मानित।  भारतीय सेना ने अति विशिष्ट सेवा मेडल से नवाजा। अमरीका में भारतीयों को मिलने वाले लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से भी सम्मानित।

नौसेना को है पॉलराज पर गर्व

कोमोडोर रह चुके पॉलराज 30 साल तक भारतीय नौसेना से जुड़े रहे। 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान नौसेना की ‘सोनार तकनीक’ (पानी में संचार या सतह पर वस्तुओं का पता लगाने के लिए ध्वनि संचरण का प्रयोग करने वाली तकनीक) में खामियों का पता चला। पॉलराज ने इसके लिए सिग्नल प्रोसेसिंग की नई थ्योरी की खोज की और तीन साल बाद इसका प्रयोग नौसेना के बेड़ों में होने लगा। ईनाम के तौर पर पॉलराज को बतौर रिसर्च फेलो ब्रिटेन स्थित लोगब्रोग यूनिवर्सिटी भेज दिया गया। वे जब वहां से लौटे तो उन्हें सोनार इकाई से युक्त एक बड़ी सतह वाले जहाज के निर्माण का जिम्मा सौंपा गया। कठिनाइयों के बावजूद पॉलराज और उनकी टीम ने 1983 में विश्व स्तरीय सोनार जहाज ‘एपीएसएचओ’ बनाकर सेना को सौंपा। इसके लिए भारतीय नौसेना हमेशा उन पर गर्व करती है।

मीमो तकनीक बनाकर इंटरनेट को दी रफ्तार

पत्नी निर्मला के साथ स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के कैंपस में रह रहे पॉलराज 1991 में इस यूनिवर्सिटी से जुड़ेे। 1992 में उन्हें मीमो  तकनीक (सिग्नल रिसीव व ट्रांसमिट करने के लिए कई एंटीना का प्रयोग करना) पर काम करने का खयाल आया। 1994 में पेटेंट हुई उनकी यह तकनीक आज हाई स्पीड वाई-फाई और 4जी इंटरनेट की जान है। 2011 में पॉलराज एलेक्जेंडर ग्राहम बेल मेडल से सम्मानित किए जा चुके हैं। दूरसंचार विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में इसे सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है। 

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