आलेख : दावों और सच के बीच पसोपेश में अवाम

lalunitish_24_09_2015बिहार के मुख्यमंत्री ने एक अंग्रेजी अखबार लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने उन आंकड़ों को लिया है, जो राज्य का विकास दिखा रहे हैं। इसी बीच उन्होंने यह भी दावा किया है बिहार विकास में गुजरात से आगे है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहस करने की चुनौती भी दी। यह अलग बात है कि भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे खारिज करते हुआ कहा कि विकास आंकड़ों से सिद्ध किया जाता है, बहस से नहीं। जेटली ने विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि व्यापार करने की सहूलियत में गुजरात नंबर एक पर है, जबकि बिहार 21 पर।

किसी भी राज्य का विकास नापने का सर्वोत्तम तरीका होता है मानव विकास सूचकांक। बिहार इस पर भी 21वें नंबर पर है ‘सुशासन बाबू” के दस साल के कार्यकाल में। विकास का दावा ‘छह अंधे और हाथी” बनकर रह गया है। ऐसा नहीं कि बिहार में विकास के कई पैरामीटर्स बेहतर नहीं हुए हैं। नीतीश के काल में ग्रामीण विद्युतीकरण, सड़क-आबादी अनुपात, स्कूलों में पंजीकरण बेहतर हुआ है। लेकिन जो नहीं हुआ है, वह यह बताता है कि कहीं कोई बड़ी ढिलाई रही है और नीतीश सरकार उस कमी को ढंकने के लिए चुनाव के ऐन वक्त पर नामुमकिन-उल-अम्ल ऐलान के तहत हर युवा को जो 20 से 25 साल का है, बेरोजगारी भत्ते के रूप में दो बार में हजार-हजार रूपए के दर से 18000 रुपए देगी, बशर्ते उनकी सरकार बने। इस पर खर्च आएगा कोई करीब 36 हजार करोड़। अगर दस साल में विकास हुआ तो यह चुनावी घूस की पेशकश आज क्यों? क्या ये पहले बेरोजगार नहीं थे?

एनएसएसओ की ताजा रिपोर्ट देखें। एक ऐसे राज्य में जहां दस में नौ लोग आज भी घर में रोशनी के लिए मिट्टी के तेल की ढिबरी या लालटेन, खाना पकाने के लिए लकड़ी, गोबर के उपले या केरोसिन तेल का इस्तेमाल करते हों, पांच में चार व्यक्ति शौच के लिए सड़क का किनारा या खेत इस्तेमाल करते हों, आधे से ज्यादा लोग कच्ची छत के नीचे सोते हों और जहां एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार, हर दस में से नौ ऐसे निर्दोष लोगों को पुलिस जेल भेजकर मुकदमा चलाती हो जो निचली अदालत से ही बरी हो जाते हों, वहां विकास का मतलब वह नहीं होता जो हम आमतौर पर समझते हैं।

यही वजह है कि बिहार हालांकि मानव विकास सूचकांक पर देश के राज्यों में 21वें पायदान पर है लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दस साल के अपने शासन के बाद भी अपने को ‘विकास पुरुष” के रूप में जनमानस में बनाए रखने की चाहत रखते हैं। और लोगों को उनसे कोई खास नाराजगी नहीं है। चेतनाशून्यता की सात दशक की स्थिति के बाद लोगों के लिए विकास का मतलब मात्र इतना है कि ‘राजा” व्यक्तिगत रूप से आतंक नहीं करता, अपराधियों को पनाह नहीं देता, कभी-कभी सड़क भी बनवा देता है या कुछ इलाकों में बिजली पहुंचती है।

फिर प्रश्न उठता है कि यदि बिहार की जनता इतने से ही संतुष्ट हो सकती है तो नीतीश को ठीक इसके विपरीत छवि वाले लालू यादव की जरूरत क्यों पड़ी? क्या लालू को साथ न लाकर नीतीश अपनी इमेज को और बेहतर नहीं बनाते? इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक है। लेकिन हर नेतृत्व में खामियां और अच्छाइयां होती हैं। नीतीश की कमजोरी यह रही कि उन्होंने पिछले दस वर्षों में कभी भी अपनी पार्टी जदयू को एक पार्टी की तरह नहीं रखा और न ही कैडर विकसित होने दिया। भाजपा और नीतीश का साथ इसलिए निभता रहा कि यह अंधे-लंगड़े की जोड़ी बने गए, यानी नीतीश के पास इमेज, पर कैडर नहीं और भाजपा के पास कैडर, पर नेता नहीं। लालू यादव को महागठबंधन में शामिल करना इसी कैडर की कमी को पूरा करने के लिए किया गया।

लालू के प्रति लोगों का (खासकर उच्च जाति का) गुस्सा चाहे जैसा हो, यह हकीकत है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 के आम चुनाव के दौरान हासिल जबरदस्त जनस्वीकार्यता के बावजूद इस यादव नेता को 20.5 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 29.4 प्रतिशत। कहने का तात्पर्य यह कि आज भी लालू के पास प्रतिबद्ध वोट और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं। यही वजह है कि नीतीश इस चुनाव में लालू के साथ कम नजर आ रहे हैं और मात्र अपने काम की दुहाई दे रहे हैं। भाजपा यह समझ गई है कि नीतीश को हराना हो तो जनता में यह विश्वास बैठना होगा कि चूंकि लालू और नीतीश 100-100 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं, लिहाजा बिना लालू के शासन नहीं चल सकता और नीतीश भले ही सीएम बने, शासन लालू ही चलाएंगे।

जनता का गुस्सा नीतीश सरकार से नहीं है और हाल में चुनाव-पूर्व जितने भी सर्वे आए, उनमें नीतीश को मतदाताओं की ज्यादा पसंद माना गया। ऐसा नहीं कि भाजपानीत एनडीए को नकारा गया हो फिर भी अगर दस साल के शासन में और अभाव या प्रशासनिक अकर्मण्यता के बाद भी एंटी-इनकम्बेंसी नदारत है और जनता ऊबी नहीं है तो इसके कारण तलाशने होंगे।

बिहार के मुख्यमंत्री की तुलना मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से की जा सकती है। मध्य प्रदेश में हर हफ्ते भ्रष्टाचार के मामले उजागर होते हैं, विकास के कुछ पैरामीटर्स पर राज्य वैसे ही आगे या पीछे है जैसे बिहार में। दोनों राज्य प्रति-व्यक्ति आय में राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं, हालांकि बिहार सबसे नीचे है और मध्य प्रदेश की प्रति-व्यक्ति आय (जीएसडीपी प्रति-व्यक्ति के रूप में) बिहार से डेढ़ गुनी है। लेकिन राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। किंतु शिवराज की व्यक्तिगत छवि साफ-सुथरी है। जनता में भरोसा है कि यह व्यक्ति मुजरिमों या भ्रष्टाचारियों को प्रश्रय नहीं देता।

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