अन्न ब्रह्म तो अन्‍नदाता विवश क्यों?

farmer-main_01_11_2015वेद-परंपरा में अन्न् को भी ब्रह्म कहा गया है। शायद दूर की कौड़ी लगे, लेकिन पिछले महीने जब ‘भारत-प्रेमी” अर्थशास्त्री एंगस डिटॉन को नोबेल पुरस्कार मिलने की खबर आयी तो मन में यही पंक्ति गूंजी। बुद्धि ने ‘ब्रह्म” शब्द का चुपके से अनुवाद किया ‘लोक-कल्याण”, क्योंकि डिटॉन के अर्थशास्त्रीय योगदान को वेद-परंपरा के शब्दों के भीतर समेटने वाला सबसे निकट का शब्द है : ‘अन्न्”, जो कि अपने नैतिक अर्थों में त्यागपूर्वक भोग के ही निमित्त है!

वेद-परंपरा के ब्रह्म को आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य-व्यवस्था के एक प्रत्यय ‘लोक-कल्याण” का वाचक मानने में बड़ी कठिनाई है। लेकिन इस कठिनाई को पार पाने का नाम ही भारतीय आधुनिकता है। आधुनिक हिंदी साहित्यकारों के अग्रज भारतेंदु तो बेखटके कहते थे कि हमारी भाषा में ‘नेशन” या ‘पब्लिक” का कोई पर्याय नहीं है। अर्थनीति हो, राजनीति या संस्कृति हो, इनमें प्रयुक्त आधुनिक पदों को समझने में हम भाव देखते हैं, वस्तुगत स्थिति नहीं। इंडिविजुअल के लिए जब ‘व्यक्ति” का प्रयोग होता है और ‘नेशन-स्टेट” के लिए ‘राष्ट्र-राज्य” का तो यह खयाल कभी हमारे मन में नहीं आता कि ‘व्यक्ति” तो संस्कृत-काव्यशास्त्र का पद है और ‘राष्ट्र” वेदों का, जबकि ‘नेशन-स्टेट” का पूरा पसारा इहलौकिक विधि आधारित ‘शासन” पर आधारित है। और विधि किसी देव की देन नहीं, वैज्ञानिक बुद्धि संपन्न् सयानों के बीच लोक-कल्याण को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनी ‘सहमति” का नाम है।

आज जब देश में अन्‍नदाता की स्थिति संकटमय होती जा रही है, ऐसे में अपनी जीवन-दृष्टि को अन्न्-ब्रह्म की भावना पर एकाग्र करने का गहरा महत्व है। अगर ‘अन्न्” शब्द का अर्थ-विस्तार करें और उसमें रोटी के साथ-साथ सेहत, शिक्षा और आवास जैसी बुनियादी जरूरत की चीजों को भी शामिल करें तो बेधड़क कहा जा सकता है कि डिटॉन की प्रेरणाएं लोक-कल्याण को सुनिश्चित करने में राज्य की भूमिका को निर्णायक मानती हैं। आमदनी नहीं, उपभोग की गणना कीजिए, डिटॉन का अर्थशास्त्र यही कहता प्रतीत होता है। वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग ही लोक-कल्याण का निर्धारक है। उपभोग कर सकने लायक स्थितियों का बंटवारा राज्य-व्यवस्था के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक दायरे में ढेर सारे मसलों पर असर डालता है, जिसमें गरीबी और गैर-बराबरी जैसे मसले भी शामिल हैं। गणना जब समाज के गरीब लोगों की हो तो उसका पैमाना सिर्फ आमदनी को नहीं बनाया जा सकता। गरीबी और गैर-बराबरी को मापने का पैमाना व्यक्ति की सामाजिक स्थितियों को बनाया जाना चाहिए, जो उसके उपभोग के स्तर को प्रभावित करती हैं।

डिटॉन को भारत-प्रेमी अर्थशास्त्री कहा जाता है। उनके काम का बहुलांश भारत तथा अन्य विकासशील देशों से संबंधित है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर नीति-निर्माण के लिहाज से या फिर चल रही नीतियों की समीक्षा के लिहाज से भी डिटॉन के अर्थशास्त्रीय योगदान को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। मिसाल के लिए पिछले साल नेशनल सैम्पल सर्वे की एक रिपोर्ट आई थी। रिपोर्ट ने बताया कि देश के चौदह बड़े राज्यों के ग्रामीण इलाके में लोगों को रोजाना 2400 कैलोरी का भोजन भी हासिल नहीं होता है। जाहिर है, भारत के भीतर मौजूद इस छुपी हुई भुखमरी की व्याख्या यह कहकर नहीं हो सकती कि गुजरात, महाराष्ट्र या तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों में आर्थिक-वृद्धि दर कितनी तेज रही है या फिर ये राज्य प्रति व्यक्ति आमदनी के मामले में बाकी राज्यों से कितने आगे हैं।

छह साल पहले अवाम का अर्थशास्त्री कहे जाने वाले ज्यां द्रेज के साथ मिलकर लिखे और ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित अपने लेख में डेटॉन ने भारत में मौजूद छुपी हुई भुखमरी की इस दशा का संकेत कर दिया था। दोनों ने इस लेख में सप्रमाण बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था भले ही अप्रत्याशित गति से बढ़ रही हो, जीडीपी बढ़ रहा हो, प्रति व्यक्ति आय में इजाफा हो रहा हो लेकिन प्रति व्यक्ति कैलोरी-उपभोग की मात्रा आमदनी की बढ़वार की तुलना में समाज के हर आय-वर्ग के लिए समरूप नहीं है, निचले आय-वर्ग के लोगों में कैलोरी उपभोग घटा है। आम जुबान में कहें तो जो साल विकास के साल कहलाए, वे ही आम जनता के बहुलांश के लिए कुपोषण के साल रहे। कोई चाहे तो कह सकता है कि इस स्थापना का सीधा रिश्ता भारत में बने भोजन के अधिकार कानून से है।

एंगस डिटॉन का अर्थशास्त्रीय योगदान कई अर्थों में अमर्त्य सेन के सोच का समवर्ती है। सेन कहते हैं : ‘उच्च वृद्धि-दर की जांच की कसौटी यह होनी चाहिए कि उसका लोगों की आर्थिक बढ़ोतरी और स्वतंत्रता पर क्या असर पड़ता है, भले ही यह कितनी भी टिकाऊ क्यों ना हो। तेज आर्थिक बढ़ोतरी की इस अवधि में कुछ लोगों, खासकर धनी वर्ग के लोगों को भले फायदा हुआ है, बहुत-से लोग तो एक डावांडोल भविष्य की आशंका से भरा वंचित जीवन ही जी रहे हैं।

 

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