अगर खुदा का पाना हैं नूर, तो कुरआन में लिखी इन बातों को रमजान में जरुर करें

रमजान सही मायनों में सोशल जस्टिस का महीना है। यह रोजे के साथ ही त्याग, तपस्या और सामाजिक इंसाफ की अवधारणा पेश करता है। रमजान साल भर में आने वाले बाकी के 11 महीनों के सामाजिक और धार्मिक एजेंडे के प्रबंधन का प्रशिक्षण माह भी है। इस महीने की व्यवस्था और शिक्षा बाकी 11 महीनों में भी सामाजिक व आर्थिक बराबरी का आदर्श पेश करती हैं। कुरआन में अल्लाह ने कहा है, ‘ऐ ईमान वालो! तुम पर रोजा फर्ज किया गया जिस तरह तुम से पहले लोगों पर किया गया था। इस अपेक्षा के साथ कि तुम रोजे की बदौलत धीरे-धीरे मुतक्की (भक्त) बन जाओ।’ (सूरह: अलबकर)अगर खुदा का पाना हैं नूर, तो कुरआन में लिखी इन बातों को रमजान में जरुर करें

यह हकीकत है कि सृष्टि के तमाम जीवों में मानव ही खुद को नियंत्रित कर सकता है और सारे जीवों में उसे यही विशिष्टता सर्वोच्च बनाती है। अल्लाह के निर्देशों में इसकी व्याख्या है, ‘जिसने अपनी आत्मा को पवित्र और इच्छाओं को नियंत्रित कर लिया, उसका कल्याण हो गया। जिसने ऐसा न किया उसने खुद को तबाह कर लिया।’ वैश्विक और शारीरिक दृष्टि से रोजा सक्रियता, सब्र, कृतज्ञता, हमदर्दी, मजबूती और प्रबंधन जैसी क्षमताएं प्रदान करता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण भूख और प्यास जैसी एक दूसरे की प्राथमिक आवश्यकता के प्रति सावधान होना है। वैज्ञानिक दृष्टि से 11 महीनों में शरीर में एकत्र होने वाले जीवन रोधी तत्वों को रोजे के माध्यम से समाप्त किया जा सकता है।

सामाजिक न्याय के प्रति मानवीय सरोकारों को पूरा करने के लिए भी यह महीना एक अंतिम समय सीमा है। प्रत्येक सक्षम मुसलमान पर उसकी कुल संपत्ति का ढाई प्रतिशत जकात जरूरतमंद को अदा करना अनिवार्य है। जरूरतमंदों में पहले क्रम पर नजदीकी, दूसरे क्रम पर बेसहारा, तीसरे क्रम पर गरीब, चौथे क्रम पर मुसाफिर और पांचवे क्रम पर फकीर आते हैं। पात्र मुस्लिमों को प्राथमिकता इसलिए है कि जकात लेने वाला भविष्य में जकात देने में सक्षम हो सके।

इसी तरह सदका-ए-फितर आपसी हमदर्दी और सहायता की सबसे आसान व्यवस्था है। ईद की नमाज पढ़ने से पूर्व इसे अदा करना वाजिब है, जो नाबालिग बच्चों पर भी लागू है और इनके अभिभावकों द्वारा इसे चुकाने की व्यवस्था है। प्रत्येक व्यक्ति की ओर से पौने दो किलो गेहूं, या इसका आटा या सत्तू अथवा इसका मूल्य या मूल्य के बराबर दूसरा अनाज किसी भी जरूरतमंद गरीब को अदा किया जाता है जो सामाजिक बराबरी की अवधारणा को लागू करता है। सदका उस पर वाजिब है जो आर्थिक रूप से संपन्न या 52 तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोने का मालिक हो। इसकी अदायगी को अल्लाह के यहां रोजे की स्वीकारोक्ति और उसके प्रति कृतज्ञता का माध्यम माना गया है लेकिन व्यावहारिक रूप से यह गरीबों व जरूरतमंदों में खुशहाली लाने के लिए है।

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