सूर्य को अर्घ्य देते समय भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, जानें क्या कहता है शास्त्र

सनातन धर्म में सूर्य देव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो हमें साक्षात दर्शन देते हैं। सुबह सूर्य को जल चढ़ाना (अर्घ्य देना) न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि स्वास्थ्य और ज्योतिष के लिहाज से भी अत्यंत लाभकारी माना गया है। लेकिन, अक्सर लोग अनजाने में जल देते समय कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं, जिससे उन्हें पूजा का पूरा फल नहीं मिल पाता।
सूर्य को जल देते समय होने वाली 5 बड़ी गलतियां
- जल चढ़ाने का गलत समय: अक्सर लोग सोकर उठने के बहुत देर बाद, यानी जब धूप तेज हो जाती है, तब सूर्य को जल देते हैं। शास्त्रों के अनुसार, सूर्य को जल देने का सबसे उत्तम समय ‘ब्रह्म मुहूर्त’ या सूर्योदय के एक घंटे के भीतर का होता है। तेज धूप में जल देने से उसका वह आध्यात्मिक प्रभाव नहीं रह जाता।
- पैरों पर जल की बूंदों का गिरना: जल देते समय सबसे बड़ी गलती यह होती है कि लोटे से गिरने वाला जल सीधा पैरों पर पड़ता है। इसे ज्योतिष शास्त्र में अशुभ माना गया है। जल देते समय लोटे को इतना ऊंचा रखें कि जल की धारा आपके पैरों पर न गिरे। संभव हो तो नीचे किसी गमले या पात्र को रख लें।
- तांबे के पात्र का प्रयोग न करना: कई लोग स्टील, कांच या प्लास्टिक के बर्तनों से जल चढ़ाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, सूर्य को जल देने के लिए केवल तांबे (Copper) के लोटे का ही उपयोग करना चाहिए। तांबे और सूर्य की ऊर्जा का मेल शरीर के औरा (Aura) को मजबूत करता है।
- नजरें जल की धारा पर न होना: ज्यादातर लोग जल चढ़ाते समय अपनी आंखें बंद कर लेते हैं या इधर-उधर देखते हैं। सही नियम यह है कि जल की गिरती धारा के बीच से सूर्य देव के दर्शन करने चाहिए। इससे सूर्य की किरणें जल से छनकर आपकी आंखों और शरीर के सात चक्रों पर पड़ती हैं, जो आंखों की रोशनी और एकाग्रता बढ़ाती हैं।
- बिना मंत्र और नंगे पैर न होना: बिना मंत्र के जल देना केवल पानी गिराने जैसा है। अर्घ्य देते समय कम से कम 3 बार “ॐ सूर्याय नमः” का जप जरूर करें। साथ ही, सूर्य को जल देते समय जूते-चप्पल उतारकर नंगे पैर जमीन पर खड़ा होना चाहिए ताकि पृथ्वी का संपर्क बना रहे।





