शरीर के हर अंग की रक्षा करता है यह एक कवच?

भगवान शनि महाराज के प्रकोप से सुरक्षित रहने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए शनि रक्षा कवच का नियमित पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। यह दिव्य कवच जातक को शनि की साढेसाती, ढैय्या और शनि की प्रतिकूल दशाओं के नकारात्मक प्रभाव से सुरक्षा प्रदान करता है।

खासकर शनिवार के दिन सूर्यास्त के बाद इसका पाठ करना सबसे प्रभावशाली होता है। ये जीवन में आने वाले संकटों को टालने में मदद करता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह शक्तिशाली कवच शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा करता है। साथ ही, व्यक्ति के मन से अकाल मृत्यु का भय भी दूर कर देता है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ इस कवच का सस्वर पाठ करते हैं। उन्हें शनि देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है।

श्री शनि रक्षा कवच |
।।विनियोग।।

अस्य श्री शनैश्चरकवचस्तोत्रमंत्रस्य कश्यप ऋषिः ।।

अनुष्टुप् छन्दः ।। शनैश्चरो देवता ।। शीं शक्तिः ।।

शूं कीलकम् ।। शनैश्चरप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।।

निलांबरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् ।।

चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद्वरदः प्रशान्तः ।। 1 ।।

श्रुणूध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् ।

कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् ।। 2 ।।

कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम् ।

शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ।। 3 ।।

ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनंदनः ।

नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कर्णौ यमानुजः ।। 4 ।।

नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा ।

स्निग्धकंठःश्च मे कंठं भुजौ पातु महाभुजः ।। 5 ।।

स्कंधौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रदः ।

वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितत्सथा ।। 6 ।।

नाभिं ग्रहपतिः पातु मंदः पातु कटिं तथा ।

ऊरू ममांतकः पातु यमो जानुयुगं तथा ।। 7 ।।

पादौ मंदगतिः पातु सर्वांगं पातु पिप्पलः ।

अङ्गोपाङ्गानि सर्वाणि रक्षेन्मे सूर्यनंदनः ।। 8 ।।

इत्येतत्कवचं दिव्यं पठेत्सूर्यसुतस्य यः ।

न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्यजः ।। 9 ।।

व्ययजन्मद्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोSपि वा ।

कलत्रस्थो गतो वापि सुप्रीतस्तु सदा शनिः ।। 10 ।।

अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे ।

कवचं पठतो नित्यं न पीडा जायते क्वचित् ।। 11 ।।

इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यनिर्मितं पुरा ।

द्वादशाष्टमजन्मस्थदोषान्नाशायते सदा ।

जन्मलग्नास्थितान्दोषान्सर्वान्नाशयते प्रभुः ।। 12 ।।

।। इति श्रीब्रह्मांडपुराणे ब्रह्म–नारदसंवादे शनैश्चरकवचं संपूर्णं ।।

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