लघु कथा : परछांई

डॉ. कुमुद श्रीवास्तव वर्मा ‘कुमुदनी’
यह सत्य प्रमाणित है कि परछांई भी कभी कभी आपके भेद खोल देती है,
*तुम न बोलो सनम परछांई से पता पूंछेंगे ,
दूरियां बढ़नें की जमानें से खता पूंछेंगे *
एक पल को तो सोनल को खुद अपनीं आँखों से देखनें पर विश्वास नहीं हुआ, कि परछांई में दिखनें वाला शख्स उसका अपना पति ही है, किंतु यह भी सत्य था कि परछांई वाले व्यक्तिनें कुर्ता पायजामा पहन रखा था, जोकि उस दिन घर में केवल उसके पति नें ही पहना था, वह चंद मिनटों पहले ही उसके कमरे से निकल सीढ़ी की ओर गया था । मात्र दो ही दिन हुये थे, सोनल विदा होकर पति के घर आई थी । मायके ससुराल की ज्यादा दूरी नहीं थी, किन्तु पहले लड़की दिखानें के वक्त घर वाले देखे, लड़का आधुनिक युग का था, पर लड़की न देखनें का कारण अब उसकी समझ में संदेह के रूप में स्पष्ट हो रहा था ।
सुबह का नाश्ता सोनल और उसके पति दोनों का उनके कमरे में ही जिठानीं नें ठिठोली करते पहुंचा दिया था । सोनल व राज नें मीठी मीठी बातें करते हुये संग ही नाश्ता किया । फिर राज कुछ काम का बहाना कर कमरे से बाहर जानें लगा, सोनल नें टोका कुर्ता पायजामा में बाहर शर्ट वगेरह बदल लीजिये, वह बोला आता हूं कहकर जल्दी कमरे के बाहर सटी सीढ़ी पर चढ़नें लगा । सोनल कमरे का परदा हटा कर यूं पलंग पर पैर लटका बैठ गयी, बड़ा घर होनें के कारण चहल पहल समझ नहीं आती थी कि विवाह का घर है ।
सोनल मन ही मन शादी व आकर्षक व्यक्तित्व के पति को पाकर खुश थी । गुनगुंनाती हुई वह ख्यालों में खो गयी । अचानक उसकी तंद्रा भंग हुई जब उसनें दरवाजे के सामनें की दीवार पर पड़ती सूर्य की रोशनीं में सीढ़ी पर दो लोगों के साथ साथ होनें की परछांई दीवार पर बनीं देखी, सहसा उसे विश्वास नहीं हुआ कि वह जो देख रही है वह उसके शादी शुदा जिंदगी को हिला देनें वाला प्रसंग है, फिर उसनें ध्यान से देखा तो प्रमाण पुख्ता हो गये कि ये राज़ ही हैं, क्योंकि कमरा और सीढ़ी घर के भीतरी भाग में बड़े आंगन के बाद था, कोई दूसरा यदि प्रवेश करता सासूमां के कमरे से ही होकर आंगन में आना होता, सोनल बिना सूबूत के कुछ पूंछ भी नहीं सकती थी राज से, परछांई देखनें के बाद एक प्रश्न उसके मष्तिष्क में कौंध रहा था कि सीढ़ी पर दूसरा कौन है? यूं ही अपनें उलझन में फंसी, परछांई के द्वारा दिखाये राज के इस राज़ का पर्दाफाश वह किस आधार पर करती, सो चुप ही रहना बेहतर समझा । पति से कुछ पूंछनें या बोलनें की हिम्मत न जुटा पायी । तब तक राज सीढ़ियों से उतर कमरे आया और कपड़े बदल कर बाहर निकल गया ।
सोनम नें चुपी साध ली । दूसरे दिन भी नाश्ते के वक्त सोनम को सबके साथ न दे उसकी जिठानीं नें स्वयं ही दोनों का नाश्ता लाकर कमरे में दे दिया । सोनम राज नें संग में नाश्ता किया सोनम नें चुप्पी लगा ली थी पर राज़ इन सबसे अंजाना, नाश्ता समाप्त कर कमरे के बाहर सीढ़ियों की ओर बढ़ा । आज भी सोनम को वह दृश्य अंदर तक हिला गया पर नयी नवेली होनें के कारण वह बोल न सकी । अब जिठानीं द्वारा रोज ही सोनम राज़ को नाश्ता कमरे में ही दिया जाता । धीरे धीरे दोनों में दूरियां बढ़ रही थीं । पर राज़ बेबाक किस्म का होनें के कारण इन सब बातों पर गौर नहीं करता था ।
सोनम के मन के भीतर परछांई रोज़ ही अपना स्वरूप दिखाकर बवडर के रूप में हर पल मंडराती रहती । धीरे धीरे दस दिन हो गये । अब बात मायकेके लिये विदाई करानें की आई । सोनम नें सोचा कि ‘मैं चली गई तो ये तो खुकर यह काम करेंगे और मायके गई भी तो मां पापा तो निश्चित ही मेरेचेहरे का हाव भाव देख भांप जायेगें’ । सो सासूमां से कुछ दिन यहीं रहनें का कहलवा कर मायके जानें से मना कर दिया । वह परछांई का रहस्य व साथ वाली के विषय में जानना चाहती थी ।
एक दिन जब सोनम के पति, जेठ व जेठानीं सभी ऑफिस के लिये जा चुके थे तो उसकी सास नें दोपहर को सोनम को अपनें पास बुलाया और बोली, ‘मैं तुम्हारा दिन पर दिन मुरझाता हुआ चेहरा देखकर तुम्हारी परेशानी सब कारण समझ गई हूं, बेटी वह तुम्हारी जिठानीं ही है, जो अपनें पिता की इकलौती वारिस है । पिता बहुत बड़े व्यवसायी थे । करोड़ों का बिजनेस है । वो अब इस दुनियां में नहीं हैं । तुम्हारे जेठ उन्हीं की कम्पनीं में काम करते हैं । तुम्हारी जेठानीं बहुत ही तेज तर्रार महिला है । राज़ की नौकरी एक मल्टीनेशनल कम्पनीं में लगी थी, कितुं इसनें अपनें प्रभाव से राज़ के विषय में गलत जानकारी दिलवाकर चोरी के इल्ज़ाम के द्वारा कम्पनीं से बाहर करवा, अपनें आफिस में काम करनें को मजबूर कर दिया है । यह सुलोचना ( तुम्हारी जेठानीं) राज़ के संग पटना विश्वविद्यालय में साथ पढ़ती थी, तब से राज़ को अपनें जाल में फंसायी है । बेटी यह वो नागिन है जो बिल से ही जहर फेंक रही । मैं बेबस बुढ़िया इसके जुल्म का शिकार हूं, यहजितनीं अच्छी ऊपर से दिखती है उतनीं ही खतरनाक है । मेरे दोनों बेटे विवश हैं । नौकरी का सवाल है अब उम्र भी हो गयी है, दूसरी नौकरी मिलनीं मुश्किल है । राज़ का विवाह करनें की सलाह तुम्हारे जेठ नें ही दी, ताकि इसके चंगुल से हो सकता है छुटकारा मिल जाय । राज़ की मजबूरी है इस डायन से मिलना । अब तुम्हारे समानें अपना और राज़ का भविष्य है । तुम इस मुसीबत से कैसे निपटती हो, मैं और तुम्हारे जेठ स्वयं राज़ भी तुम्हारे साथ हैं ।
सबकुछ सुनने के बाद सोनल के चेहरे पर की उदासी थोड़ी छंटी और वह सासू जी से इस समस्या को खत्म करनें की कसम खा कर परछांई से पूर्णतः निजात पानें की योजना के विषय में सोचनें लगी ।
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