राखीगढ़ी के टीलों के खुलेंगे राज: हड़प्पाकालीन स्थल में चौथे चरण की खोदाई शुरू

विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में शामिल हड़प्पाकालीन स्थल राखीगढ़ी में एक बार फिर मिट्टी में दफन इतिहास के पन्ने खुलने वाले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के महानिदेशक वाईएस रावत ने वीरवार को यहां चौथे चरण की खोदाई की औपचारिक शुरुआत की। इससे पहले तीसरे चरण की खोदाई मई 2025 में बंद कर दी गई थी।

रावत ने टीला नंबर एक पर विधिवत पूजा के बाद औजारों पर टीका लगाया और स्वयं खोदाई का शुभारंभ किया। उन्होंने बताया कि इस बार खोदाई प्रक्रिया तीन साल के लिए शुरू की गई है। यह चरण इससे पहले की गई खोदाई से अलग और बेहद महत्वपूर्ण है। हमारा उद्देश्य राखीगढ़ी के सातों टीलों के आपसी संबंधों को समझना है।

खोदाई के दौरान जांच की जाएगी कि क्या बार-बार आई बाढ़ के कारण नगर के कुछ हिस्से कट गए और उन्होंने धीरे-धीरे टीलों का रूप ले लिया या फिर किसी प्राकृतिक घटना ने इस नगर को कई भागों में बांट दिया। ऐसा भी हो सकता है कि आवासीय क्षेत्र, व्यावसायिक गतिविधियों के केंद्र, कारीगरों की बस्तियां और प्रशासनिक या सार्वजनिक गतिविधियों के लिए अलग-अलग टीले बनाए गए हों।

टीलों की निचली सतह से खोदाई की जाएगी
रावत ने बताया कि इस बार की खोदाई की एक और खास बात यह है कि टीलों की निचली सतह से कार्य किया जाएगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि सातों टीले आपस में किस प्रकार जुड़े थे। यह भी अध्ययन किया जाएगा कि नगर का विकास किस क्रम में हुआ।

क्या पहले निचली सतह पर बसावट हुई और बाद में ऊपर नए स्तर बने या फिर विकास ऊपर से नीचे की ओर हुआ। यह शोध नगर के विकास और कालक्रम को समझने में बेहद अहम साबित होगा। राखीगढ़ी को हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से भी बड़ा स्थल माना जाता है।

ऐसे में यहां से मिलने वाले निष्कर्ष न केवल देश बल्कि विश्व इतिहास के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे। इस दौरान एएसआई चंडीगढ़ सर्कल से डॉ. कुबुई, डॉ. मनोज सक्सेना, राकेश सिन्हा, सोनू नागर, भूपिंदर फोनिया, डॉ. अप्पू सहारण, दिनेश श्योराण, विनीत भनवाला आदि मौजूद रहे। इससे पहले रावत ने राखी शाहपुर के ज्ञान केंद्र का भी दौरा किया। उन्होंने वहां लगाई प्रदर्शनी व खोदाई के दौरान निकलीं वस्तुओं को सहेज कर रखने के लिए केंद्र की सरहाना की।

राखीगढ़ी में अब तक हुई खोदाई का ब्योरा
पहली बार 1998 से 2000 के बीच साइट नंबर तीन पर खोदाई की गई जिसका नेतृत्व एएसआई के तत्कालीन निदेशक डॉ. अमरेंद्र नाथ ने किया।
दूसरी बार 2011 से 2016 तक साइट नंबर एक पर खोदाई कई गई, जिसका नेतृत्व प्रोफेसर वसंत शिंदे ने किया।
तीसरे चरण में 2023 से 2025 तक साइट नंबर सात पर खोदाई डॉ. संजय मंजुल के निर्देशन में की गई।

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