जयपुर. चूरू जिले के जयपुरिया खालसा गांव के देवेंद्र झाझड़िया खेल रत्न से सम्मानित होने वाले राजस्थान के दूसरे एथलीट होंगे। इससे पहले 2004 एथेंस ओलिंपिक में रजत पदक जीतने पर राजस्थान के निशानेबाज राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को खेल रत्न मिला था। खेल रत्न के लिए चुने जाने की खुशी दो बार पैरालिंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले देवेंद्र झाझड़िया के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी, लेकिन इस खुशी के पीछे उनकी संघर्षभरी कहानी भी है। उनके संघर्ष की कहानी उन्हीं की जुबानी…
जब मैं 8 साल का था तो अपने गांव में ही पेड़ पर चढ़ रहा था। पेड़ से एक हाईटेंशन वायर जा रहा था। मुझे उससे करंट लगा और मेरा बायां हाथ कोहनी से काटना पड़ा। उसके बाद से घर से बाहर निकलना मेरे लिए चुनौती बन गया था। बच्चे मुझे अपने साथ खिलाते नहीं थे। ऐसे में मेरे मां जीवनी देवी ने मुझे नई जिंदगी दी। उन्होंने मुझे खेलने के लिए जबर्दस्ती बाहर भेजा। वो चाहतीं तो मुझे पढ़ाई करने के लिए भी कह सकती थीं। उस दिन मां ने मुझे घर से बाहर नहीं निकाला होता तो शायद मैं भी पैरालिंपिक में दो गोल्ड मेडल जीतने में सफल नहीं होता।
लकड़ी के भाले से घर में ही करता था प्रैक्टिस
यह 1995 की बात है। मैं रतनपुरा के सरकारी स्कूल में पढ़ता था। वहां कुछ बच्चे जैवलिन की प्रैक्टिस करते थे। उनमें कई स्टेट लेवल के प्लेयर भी थे, लेकिन वे मुझे अपने साथ नहीं खिलाते थे। मैं उन्हें देखता रहता। फिर एक दिन मैंने घर में ही लकड़ी का भाला बनाया और प्रैक्टिस करने लगा। पहली बार जब डिस्ट्रिक्ट चैंपियन बना तो उस दिन लगा जैसे मैंने दुनिया जीत ली। डिस्ट्रिक्ट चैंपियन में जीता वह गोल्ड भी मेरे लिए पैरालिंपिक के गोल्ड से कम नहीं था। बस वहीं से मेरे खेलों का सफर शुरू हुआ।
कबड्डी प्लेयर से की शादी, एक ही स्कूल में पढ़ते थे
पत्नी मंजू खुद भी कबड्डी प्लेयर रही हैं। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे। कहती हैं कभी भी मेरे मन में ऐसा विचार नहीं आया कि इनके एक हाथ नहीं है। उन्होंने जो उपलब्धि हासिल की है वह हजारों हाथों के बराबर है। 2007 में जब मुझे पता चला कि इनके साथ मेरी शादी हो रही है तो मैं खुशी-खुशी राजी हो गई थी।
रियो मेडल के बाद मिली पहचान
2004 एथेंस पैरालिंपिक में जब मैंने गोल्ड जीता था उस समय ज्यादा पहचान नहीं मिली थी। उस समय सोशल मीडिया ज्यादा नहीं था। अब समय बदल गया है। अब केंद्र सरकार ओलिंपिक और पैरालिंपिक को बराबर मानती है और मीडिया में भी पैरालिंपिक में मेडल जीतने वाले सुर्खियां बनते हैं। 2004 और 2016 दोनों में मैंने वर्ल्ड रिकॉर्ड के साथ गोल्ड जीता था, लेकिन असली पहचान और सम्मान रियो के बाद मिला है।
राजस्थान सरकार से हैं निराश
राजस्थान सरकार द्वारा पैरा खिलाड़ियों के साथ भेदभाव अपनाए जाने से मैं निराश हूं। मैं देश का अकेला एथलीट हूं जिसने पैरालिंपिक में दो गोल्ड जीते हैं। मैं युवा खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देने के लिए एक एकेडमी खोलना चाहता हूं। मुझे उम्मीद थी कि राजस्थान सरकार कोई प्लाट वगैरह देगी।
राज्यवर्धन सिंह ने दी सबसे पहले बधाई
राजस्थान के लिए पहला खेल रत्न हासिल करने वाले और केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह ने झाझड़िया को फोन करके सबसे पहले बधाई दी। झाझड़िया ने बताया कि उन्हीं के फोन से मुझे खेल रत्न के लिए चुने जाने की जानकारी मिली।