मुंबई की आबादी का एक तिहाई हिस्सा उप्र के हिंदी भाषियों से है आबाद

मुंबई की आबादी का एक तिहाई हिस्सा उत्तर प्रदेश मूल के हिंदी भाषियों से आबाद है। दशकों पहले से मुंबई में आकर बसा यह वर्ग रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े करीब 42 प्रकार के व्यवसायों में अपना वर्चस्व बनाए हुए है। इन्हीं में से एक है मुंबई की परिवहन व्यवस्था। यानी ऑटो रिक्शा और टैक्सी ड्राइवर। यह वर्ग इस महानगरी की नब्ज से तो कदमताल करता है, अपने गांव-देश की पूरी खबर रखता है।
अपने ऑटो रिक्शा में ओला की सेवा देने वाले करीब 45 वर्षीय अमर सिंह इन दिनों परेशान हैं रेल का टिकट कन्फर्म कराने के लिए। पूरे परिवार का टिकट तीन माह पहले ही निकाल लिया था। उस समय तो चुनाव की घोषणा भी नहीं हुई थी, लेकिन अब सोच रहे हैं कि 12 मई को होने वाले मतदान से पहले अपने जिले प्रयाग पहुंच जाएं तो अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट भी दे लेंगे, लेकिन पसंद का उम्मीदवार है कौन, इस सवाल पर एक चतुर मतदाता की तरह चुप्पी साथ जाते हैं।
वहीं, मुंबई की सभी छह सीटों की भविष्यवाणी करने में कतई नहीं हिचकते। एक और ऑटो रिक्शा चालक हरीराम 18 साल से मुंबई में रह रहे हैं। परिवार आज भी भदोही में रहता है। इसलिए साल में दो-तीन बार तो फसल बोने-काटने जाना ही पड़ता है। इस बार गेहूं काटने और वोट डालने का दोहरा उद्देश्य लेकर जा रहे हैं। उन्हें यह बताने में कोई संकोच नहीं है कि उनका वोट तो मोदी को ही जाएगा। कहते हैं, बहुत काम किया है। चेहरा बदल दिया है गांव-देश का। कम से कम पांच साल के लिए तो उन्हें फिर से मौका मिलना ही चाहिए। बता दें कि मुंबई में ज्यादातर काली-पीली टैक्सियों का व्यवसाय प्रयाग और प्रतापगढ़ वालों के हाथ में है, तो ऑटो रिक्शा का बनारस, जौनपुर और भदोही वालों के। जबसे ओला-उबर आई है, सब मिलजुल गया है।
प्रतापगढ़ के रहने वाले बाबूराम गुप्ता का फिलहाल गांव जाने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन गांव की राजनीति से अनजान भी नहीं हैं। उन्हें शिकायत है कि पूरे चुनाव में कोई विपक्षी दल गांव में घर-घर बन गए शौचालय की चर्चा क्यों नहीं करता। वह मोदी सरकार के इस कार्य को सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं, क्योंकि गांवों में शौचालय न होने के कारण महिलाओं को तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। उन्हें कई बीमारियां हो जाती थीं।
प्रयाग के ही रहने वाले ऑटो रिक्शा चालक राज कुमार सिंह भी 2002 से मुंबई में रह रहे हैं। मुंबई में बिछ रहे मेट्रो के जाल से थोड़ा सशंकित हैं। उन्हें लगता है कि मुंबई में इतनी मेट्रो चल गई तो ऑटो-टैक्सी बंद हो जाएंगी, लेकिन गांव में हो रहे विकास को लेकर बड़े प्रसन्न हैं। प्रयाग कुंभ के दौरान हुए इलाहाबाद (प्रयाग) के विकास पर उनकी छाती फूल जाती है। प्रयाग और आसपास बन रही चौड़ी-चौड़ी सड़कों की खबर उन्हें भी है।
कहते हैं कि ऐसा काम तो पिछले 50 साल में किसी ने नहीं किया। इसलिए आएगा तो मोदी ही। काली-पीली टैक्सी चलाने वाले हरीराम यादव युवा हैं। बालाकोट पर हुई सर्जिकल एयर स्ट्राइक पर फिदा हैं। उत्तर प्रदेश में होने वाली जातिवादी राजनीति से भी खफा हैं। समाजवादी पार्टी का बसपा से गठबंधन उन्हें रास नहीं आ रहा है। कहते हैं, कुछ सीटें भले कम हो जाएं, लेकिन सरकार तो इस बार भी भाजपा की ही बनेगी।





