भारत यात्रा से पहले श्रीलंका राष्ट्रपति राजपक्षे ने दिया ये बड़ा बयान, कहा…

श्रीलंका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे ने कहा कि श्रीलंका, भारत के साथ मिलकर काम करेगा और वह ऐसा कुछ भी नहीं करेगा, जिससे भारत के हितों को नुकसान पहुंचे। गोतबया राजपक्षे ने इस सप्ताह के अंत में 29 नवंबर को अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर नई दिल्ली आ रहे हैं। चीन के समर्थक माने जाने वाले राजपक्षे ने कहा कि वे चाहते हैं कि श्रीलंका एक तटस्थ देश बने और सभी देशों के साथ मिलकर काम करे। राजपक्षे ने कहा कि हम भारत के साथ मित्रवत देश के रूप में काम करेंगे और ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे, जिससे भारत के हितों को नुकसान पहुंचे।
उन्होंने कहा कि हम एक तटस्थ देश बनना चाहते हैं। हम महाशक्तियों के शक्ति संघर्षों के बीच नहीं आना चाहते हैं। हम बहुत छोटे देश हैं और हम इस संतुलनकारी कृत्यों में शामिल होने के बाद जिंदा नहीं रह सकते हैं। राजपक्षे ने कहा कि वह भारत और चीन, दोनों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। हम सभी देशों के साथ काम करना चाहते हैं और हम ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहते हैं, जो उस मामले के लिए किसी अन्य देश को नुकसान पहुंचाए। हम भारतीय चिंताओं के महत्व को समझते हैं, इसलिए हम किसी भी गतिविधि में संलग्न नहीं हो सकते हैं, जिससे भारत की सुरक्षा को खतरा हो।
राजपक्षे ने कहा कि हिंद महासागर एक महत्वपूर्ण स्थान है और वर्तमान भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। श्रीलंका ऐसी जगह पर स्थित है, जिसका रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है और पूर्व से पश्चिम तक सभी समुद्री लेन देश के करीब से गुजर रही हैं। उन्होंने कहा कि इन समुद्री गलियारों को मुक्त होना चाहिए और किसी भी देश को इन्हें नियंत्रित नहीं करना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति रहने के दौरान साल 2005 से 2015 के बीच में चीन के साथ श्रीलंका की भागीदारी विशुद्ध रूप से व्यावसायिक थी। उन्होंने कहा कि मैंने भारत, सिंगापुर, जापान और ऑस्ट्रेलिया को यहां आने और निवेश करने के लिए आमंत्रित किया है। केवल चीन को देश में निवेश करने की इजाजत नहीं दे सकते हैं।
उन्होंने श्रीलंका में निवेश के अनुकूल माहौल बनाने की बात कही। राजपक्षे ने यह भी कहा कि हंबनटोटा बंदरगाह को चीन को 99 साल की लीज पर देना, राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के नेतृत्व वाली पिछली सरकार की गलती थी। उन्होंने कहा कि इस सौदे पर फिर से बात करनी होगी। निवेश के लिए एक छोटा सा ऋण देना अलग बात है, लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण एक आर्थिक बंदरगाह देना स्वीकार्य नहीं है। इसे हमें नियंत्रित करना चाहिए।
बताते चलें कि चीन ने साल 2017 में कर्ज के रूप में श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का अधिग्रहण किया था। वह इस द्वीपीय राष्ट्र के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है और जिबूती में स्थापित लॉजिस्टिक्स बेस के साथ हिंद महासागर में अपनी नौसेना की उपस्थिति का विस्तार कर रहा है। राजपक्षे ने कहा कि हम चाहते हैं कि निवेश हमारी मदद करे, लेकिन हम सैन्य और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में शामिल होने के लिए कुछ भी नहीं करेंगे।





