भारत और हिंदू विरोध पर केंद्रित होता बांग्लादेश का आम चुनाव

बांग्लादेश में नई सरकार चुनने के लिए कल 12 फरवरी को मतदान होगा। बांग्लादेश ने भारत समर्थक रुख रखने वाली शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया है और वह इन चुनावों में हिस्सा नहीं ले रही है। इससे पूरे चुनाव की वैधानिकता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी बांग्लादेश के साथ-साथ पड़ोसी देश भारत, पाकिस्तान और चीन सहित दुनिया के तमाम देश इस चुनाव पर नजर बनाए हुए हैं क्योंकि इन चुनावों से इस भौगोलिक क्षेत्र पर गहरा असर पड़ने वाला है। इस पूरे चुनाव का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि पूरे चुनाव में भारत विरोधी रुख छाया हुआ है। बांग्लादेश की कट्टरपंथी पार्टियां खुलकर भारत और हिंदुओं के खिलाफ बयानबाजी कर रही हैं और ‘काफिरों’ को वोट देने को ‘हराम’ करार दे रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश में हिंदू विरोधी रुख कठोर होने से इसका पश्चिम बंगाल चुनाव पर भी असर पड़ सकता है।

शेख हसीना सरकार के सत्ता पलट के बाद होने वाले इस महत्त्वपूर्ण चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के अध्यक्ष तारिक रहमान एक मजबूत नेता बनकर उभरते हुए दिखाई दे रहे हैं। यदि बीएनपी इस चुनाव में जीत हासिल करती है तो वे राज्य के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। राज्य की 300 सीटों में 292 सीटों पर चुनाव लड़ रही बीएनपी को अब तक के रुझानों में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने की संभावना जताई गई है।

भारत के लिए बीएनपी का सत्ता में आना कुछ परेशानी का कारण हो सकता है। बीएनपी बांग्लादेश में दक्षिणपंथी पार्टी के तौर पर देखी जाती रही है और वह कट्टरवाद को खुली हवा देने से बचने की कोशिश कर सकती है। लेकिन पाकिस्तान, जो कि बांग्लादेश के चुनावों में पर्दे के पीछे से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, और वह बीएनपी के समर्थक के तौर पर देखा जा रहा है, चुनावों के बाद नई सरकार से एक भारत विरोधी फ्रंट बनाने की रणनीति पर काम कर सकता है। यदि बांग्लादेश में पाकिस्तान और चीन की मिलीभगत से कोई रणनीतिक कदम उठाया जाता है तो यह बांग्लादेश के भारत से संबंधों को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, तारिक रहमान अब तक एक पढ़े-लिखे गैर सांप्रदायिक छवि रखने वाले बेहतर नेता के तौर पर जाने जाते रहे हैं, ऐसे में उनका प्रधानमंत्री बनना इस क्षेत्र के लिए बेहतर हो सकता है। लेकिन अभी से यह आशंका भी जताई जा रही है कि तारिक रहमान का बांग्लादेश के कट्टरपंथियों और पाकिस्तान के दबाव के बीच अपनी साफ-स्वच्छ छवि बरकरार रख पाना आसान नहीं होगा।

दरअसल, बांग्लादेश में छात्रों और युवाओं के नेतृत्व में जो सत्ता पलट हुआ था, उसमें प्रमुख भूमिका निभाने वाले छात्र और जमात-ए-इस्लामी करीब 11 दलों के गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में हैं और बीएनपी को सबसे कड़ी टक्कर वही दे रहे हैं। जनता का समर्थन हासिल करने के लिए सबसे ज्यादा कट्टर बयानबाजी भी इन्हीं दलों की ओर से की जा रही है। इन दलों के दबाव में बीएनपी नेताओं को भी ज्यादा कट्टर दिखने की होड़ लगानी पड़ रही है और इससे बांग्लादेश की चुनावी फिजा में भारत विरोध की जड़ें गहरा रही हैं।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि चुनावों में बीएनपी की जीत के बाद भी जो नई सरकार आएगी, वह जमात-ए-इस्लामी के दबाव से मुक्त नहीं होगी और वह राज्य के अल्पसंख्यकों के प्रति अधिक उदार रुख नहीं अपना सकती है जिससे राज्य में अल्पसंख्यक हिंदुओं के लिए परेशानियां बढ़ सकती हैं।

क्या पश्चिम बंगाल के चुनावों पर भी पड़ेगा असर?
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. राजकुमार फलवारिया ने कहा कि बांग्लादेश हमारा मित्र देश रहा है, लेकिन पाकिस्तान की तरह यहां भी चुनावों में भारत विरोध एक स्थाई चुनावी मुद्दा रहा है। वर्तमान संदर्भ में यह भारत के लिए ज्यादा चिंता का विषय बन गया है। पाकिस्तान और चीन जिस तरह बांग्लादेश और म्यांमार के साथ मिलकर एक गठबंधन बनाने का प्रयास करते सुने जा रहे हैं, यह भारत को तीन तरफ से घेरने की कोशिश है। लेकिन भारत की कोशिश अपनी नीतियों को आगे बढाते हुए पड़ोसी देशों को साथ लेने की होनी चाहिए। भारत ने अब तक बांग्लादेश के घटनाक्रम पर जिस तरह सधी प्रतिक्रिया दी है, उससे भी यही संकेत जाता है।

डॉ. राजकुमार फलवारिया ने कहा कि पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच रोटी-बेटी का संबंध रहा है। बांग्लादेश की कोई भी घटना सीधे तौर पर पश्चिम बंगाल के लोगों को प्रभावित करती है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह घुसपैठ विवाद बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है, यदि बांग्लादेश में भारत-हिंदू विरोध का मुद्दा गहराता है तो इसका असम और पश्चिम बंगाल के चुनावों पर भी असर पड़ सकता है।

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