भगवान विष्णु को क्यों बनाना पड़ा था साल का 13वां महीना?

हिंदू पंचांग के अनुसार, हर तीन साल में एक बार आने वाले अतिरिक्त महीने को ‘अधिक मास’, ‘मलमास’ या फिर ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है। साल में इस 13वें महीने के जुड़ने के पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा मिलती है, जिसका सीधा संबंध दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध और भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार से है। चलिए पढ़ते हैं ये अद्भुत कथा।

ब्रह्मा जी ने दिया ये वरदान
महर्षि कश्यप और अदिति के पुत्र हिरण्यकश्यप की कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उसने अमरता के करीब पहुंचने के लिए एक बेहद जटिल वरदान मांगा, जो इस प्रकार था –

यदि दास्यस्यभिमतान्वरान्मे वरदोत्तम। भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टेभ्यो मृत्युर्मा भून्मम प्रभो ।
नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपि चायुधैः। न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ।
व्यसुभिर्वासुमद्भिर्वा सुरासुरमहोरगैः। अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे ऐकपत्यं च देहिनाम् ।

श्रीमद्भागवतपुराण में वर्णित है कि हिरण्यकश्यप ने बह्मा जी से यह वरदान न किसी मनुष्य के हाथों हो, न किसी पशु के। न कोई देवता उसे मार सके, न कोई दैत्य। न दिन में मरे, न रात में। न घर के अंदर मरे, न घर के बाहर। न पृथ्वी पर उसकी जान जाए, न आकाश में।

न किसी अस्त्र-शस्त्र से मरे और न ही ब्रह्मा जी द्वारा बनाए गए साल के 12 महीनों में से किसी में। ब्रह्मा जी के ‘तथास्तु’ कहते ही हिरण्यकश्यप अहंकार में अंधा हो गया। उसने देवराज इंद्र से स्वर्ग छीन लिया और खुद को भगवान घोषित कर दिया।

भक्त प्रह्लाद की परीक्षा
हिरण्यकश्यप का अपना पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, जो दैत्यराज को बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं था। उसने प्रह्लाद की भक्ति तोड़ने के लिए उसे कई क्रूर यातनाएं दीं – जैसे पहाड़ की चोटी से फिंकवाना, पागल हाथी से कुचलवाना और अपनी बहन होलिका की गोद में बिठाकर आग में जलाना। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ।

इस तरह निकला वरदान का तोड़
जब हिरण्यकश्यप के पापों का घड़ा भर गया, तब अपने भक्त की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने ‘नृसिंह अवतार’ अवतार लिया। भगवान विष्णु का यह स्वरूप नर के शरीर और सिंह के सिर वाला था। इस प्रकार ब्रह्मा जी के वरदान की हर एक शर्त का सम्मान करते हुए भगवान ने हिरण्यकश्यप का वध किया, क्योंकि नृसिंह भगवान न तो पूरी तरह इंसान थे, न ही पशु।

उन्होंने गोधूलि बेला में हिरण्यकश्यप का वध किया, जो न तो दिन था और न ही पूरी तरह रात थी। उन्होंने महल की चौखट (दहलीज) पर अपनी जांघों पर लिटाकर अपने तीखे नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीर दिया।

इसलिए कहलाता है पुरुषोत्तम मास
हिरण्यकश्यप का वध साल के 12 महीने में नहीं हुआ। बल्कि भगवान ने उसके वरदान को निष्फल करने के लिए साल का एक अतिरिक्त 13वां महीना उत्पन्न किया, जिसे हम ‘अधिक मास’ के रूप में जानते हैं। इसी 13वें महीने (अधिक मास) में भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध करके धर्म की रक्षा की। चूंकि यह मास भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) द्वारा अपने भक्त की रक्षा के लिए निर्मित किया गया था, इसलिए इसे ‘पुरुषोत्तम मास’ भी कहा जाता है, जो अत्यंत पवित्र है।

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