प्रवासियों के भरोसे चल रहा अमेरिकी क्रिकेट

आईसीसी अंडर-19 विश्व कप के उद्घाटन मैच में जब भारत और अमेरिका की टीमें हरारे के क्वींस स्पो‌र्ट्स क्लब में आमने-सामने थीं, तब स्टैंड्स का नजारा अमेरिकी क्रिकेट की मौजूदा सच्चाई को बयां कर रहा था।

स्टैंड्स में मौजूद दर्शकों में ज्यादातर दक्षिण एशियाई मूल के माता-पिता थे, जो अमेरिकी टीम के हर रन और विकेट पर जोरदार तालियां बजा रहे थे।

गर्व और उत्साह साफ झलक रहा था, लेकिन इसके साथ ही यह एक गहरी सच्चाई की ओर भी इशारा करता था। टीम शीट पर नजर डालते ही यह स्पष्ट हो गया कि लगभग सभी खिलाड़ी दक्षिण एशियाई पृष्ठभूमि से हैं। यह कोई हैरानी की बात नहीं थी, लेकिन इससे एक अहम सवाल खड़ा होता है क्या अमेरिका में क्रिकेट अब केवल प्रवासी समुदायों तक ही सीमित रह गया है?

इतिहास को देखें तो अमेरिका कभी क्रिकेट की दुनिया में हाशिए पर नहीं था। दुनिया का पहला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच 24 सितंबर 1844 को अमेरिका और कनाडा के बीच खेला गया था। 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका के पूर्वी तट पर क्रिकेट खूब फला-फूला और बार्ट किंग जैसे महान खिलाड़ी ने स्विंग गेंदबाजी से खेल को नई दिशा दी।

लेकिन गृहयुद्ध के बाद राष्ट्रीय पहचान में बदलाव और बेसबाल के तेजी से उभरने के कारण क्रिकेट धीरे-धीरे पीछे छूट गया। आज अमेरिका में क्रिकेट की वापसी जरूर हुई है, लेकिन इसका दायरा सीमित है। यह खेल मुख्य रूप से दक्षिण एशियाई, कैरेबियाई और अफ्रीकी प्रवासी समुदायों तक ही सिमटा हुआ है।

इसकी एक बड़ी वजह एनसीएए (नेशनल कालेजिएट एथलेटिक एसोसिएशन) में क्रिकेट को मान्यता न मिलना है। अमेरिका में किसी भी खेल की जड़ें कालेज सिस्टम से जुड़ी होती हैं। क्रिकेट को यह मंच न मिलने के कारण स्कूल और कालेज स्तर पर इसका विकास नहीं हो पा रहा। 2024 के टी-20 विश्व कप की सह मेजबानी के दौरान भी अमेरिका क्रिकेट को व्यापक पहचान नहीं दिला सका।

न्यूयार्क में भारत-पाकिस्तान मैच सुबह के समय रखा गया, ताकि भारतीय उपमहाद्वीप के दर्शकों को ध्यान में रखा जा सके। इससे साफ हुआ कि अमेरिकी क्रिकेट अभी भी देश के भीतर के दर्शकों से ज्यादा बाहरी बाजार पर निर्भर है। प्रशासनिक अस्थिरता ने समस्या को और गंभीर बना दिया है।

यूएसए क्रिकेट लंबे समय से नेतृत्व संकट और आइसीसी के हस्तक्षेप से जूझ रहा है। अब जबकि 2028 लास एंजिलिस ओलंपिक में क्रिकेट शामिल होने जा रहा है, यह अमेरिका के लिए सुनहरा मौका है। लेकिन एनसीएए में मान्यता और मजबूत प्रशासन के बिना, यह अवसर भी सीमित असर ही डाल पाएगा। अमेरिकी क्रिकेट की असली चुनौती अब संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को व्यापक और मजबूत बनाने की है।

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