पाकिस्तान में रहते थे ये, 15 साल की उम्र में देखा था बंटवारे का वो भयानक मंजर

अमृतसर.वे तारीख आज भी मुझे याद है… 3 मार्च 1947। मेरी उम्र साढ़े 15 साल थी। हमारा परिवार तहसील कहूटा जिला रावलपिंडी में रह रहा था। वहीं के सरकारी स्कूल में दसवीं की परीक्षाएं शुरू हुई थी और पहला पेपर अंग्रेजी का था। पूरी कक्षा में 25 विद्यार्थी थे। तभी अल्ला हू अकबर की आवाजें आने लगी। हम घबरा गए, लेकिन हमारे स्कूल के हैड मास्टर ने कुछ मौलवियों को इकट्ठा किया और उन्हें आदेश दिया कि इन सभी बच्चों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाकर आए।पाकिस्तान में रहते थे ये, 15 साल की उम्र में देखा था बंटवारे का वो भयानक मंजर
 
वो मंजर डरावना था। मुस्लिम अपने हाथों में तलवारें लेकर खड़े थे। वह पहला दिन था, जब बंटवारे की दास्तां शुरू हुई थी। अब अमृतसर के जे पॉल एवेन्यू में रहने वाले 86 वर्षीय रघुबीर सिंह ने बंटवारे की दास्तां कुछ इन शब्दों में बयां की। रघुबीर सिंह ने बताया कि यह भारत का बंटवारा नहीं, बल्कि वे घटनाएं फसाद थे।
आंखों के सामने मरते देखा था अपने आया को…
-रघुबीर सिंह ने बताया कि उस दिन सभी हिंदू-सिख परिवारों ने अपने घर छोड़ दिए।
– उन्होंने पिता ईशर सिंह के साथ पास ही रहने वाले गुलाब सिंह के घर में पनाह ली। वहां कई अन्य परिवार भी ठहरे हुए थे। रात भर पहरा दिया।

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-एक ही आदेश था, अगर कोई हवेली की दीवार चढऩे लगे तो तलवारों से हाथ काट दो। उस दिन दिल से डर निकल गया।
उसके बाद गुरुद्वारों में एनाउंसमेंट शुरू हो गई कि सभी हिंदू-सिख परिवार यहां आ जाए। दो दिनों तक फिर गुरुद्वारे में रुके।
-वहां अपने सामने आया को गोली लगती देखी, जो पास ही जामा मस्जिद से चली थी।
-इसके बाद पूरा गांव रावलपिंडी के कैंप में आकर ठहर गया।
-जहां भी नजर दौड़ाओ लाशें ही दिखती थी।
– मुस्लिम परिवार जो गांव में रहते थे, उन्हें कभी खतरा नहीं था। दंगे करने वाले तो मुसलमान बाहर से आए थे।
-उनके फूफा जो आर्मी में थे, उन्होंने हमें ट्रेन में बिठाया और हम सब देहरादून आ गए।

घर लूट ले गए थे मुसलमान…
दो दिन के बाद गांव के कुछ बड़े-बजुर्ग अपने घरों में सामान लेने गए। उनके पिता भी उनके साथ थे। वापस लौटे तो उन्होंने बताया कि सभी के घर लुट चुके हैं। घरों में कहीं पैसे व गहने दबाकर रखे थे, वे अपने साथ ले आए। उनके पिता ने रावलपिंडी बैंक से पैसे निकलवाए। जिसके सहारे मसूरी में एक रेस्त्रां खरीदा। जिसका नाम खालसा था। रघुबीर सिंह ने बताया कि भारत आकर उन्होंने लखनऊ से इंजीनियरिंग की और आर्मी में एमआईएस ज्वॉइन कर लिया। रिटायरमेंट हो चुकी है और अब परिवार के साथ अमृतसर में ही समय गुजरता है।
पाकिस्तान बनने से पहले शुरू हो गए थे फसाद…
राजनीतिज्ञ गलियारों में अभी पाकिस्तान की नींव नहीं रखी गई थी, लेकिन मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग उठने लगी थी। पाकिस्तान का जन्म तो 15 अगस्त 1947 को हुआ, लेकिन ये फसाद तो मार्च में शुरु हो गए थे। फरवरी 1947 को मास्टर तारा सिंह का गांव में संदेश आया था कि अगर किसी को दिक्कत है तो यहां से चले जाएं। सुरक्षा के बीच दिल्ली तक पहुंचा दिया जाएगा। लेकिन तब सोचा नहीं था कि एक माह के बाद ही हालात बदल जाएंगे।
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