देश-विदेश में है गया के तिलकुट की मांग, 10 हजार लोगों को मिला है काम

गया. बिहार की पवित्र धर्म नगरी गया के तिलकुट की विशेष मिष्ठान के रूप में अलग पहचान है। विदेशी पर्यटक भी तिलकुट का स्वाद चखने के लिए बेताब रहते हैं। वैसे तो यहां साल भर तिलकुट की बिक्री होती है, लेकिन सर्दी के मौसम में इसकी मांग बढ़ जाती है। अक्टूबर शुरू होते ही सोंधी महक से शहर गुलजार हो जाता है।
देश-विदेश में है गया के तिलकुट की मांग, 10 हजार लोगों को मिला है काम
गया में तिलकुट किसी फैक्ट्री के मशीन से नहीं बनाई जाती। इसे कारीगर हाथ से कूटकर बनाते हैं। मकर संक्राति जैसे महापर्व पर तिल से बनी वस्तुओं के दान व खाने की धार्मिक परंपरा रही है। इसी महत्व को ध्यान में रखकर तिलकुट का निर्माण किया जाता है। करीब 150 साल पहले गया के रमना मुहल्ले में तिलकुट बनना शुरू हुआ था। तिलकुट बनाने की शुरुआत करने वालों के वंशजों ने आज इसी कुटीर उद्योग का रूप दे दिया है। गया में बने तिलकुट की मांग विदेशों में भी है। तिलकुट को डिब्बा बंद कर कर दूर-दराज के क्षेत्रों से लेकर विदेश तक भेजा जाता है।
 
कैसे बनता है तिलकुट
तिलकुट बनाना बहुत मेहनत और धैर्य का काम है। तिल की कुटाई-छटाई करने के बाद उसे कपड़े में लपेटकर फल्गु नदी के पानी में भिंगोकर रहा जाता है। इसके बाद तिल को पिटकर उसका छिलका हटाया जाता है फिर उसे धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद गुड़ या चीनी की चाशनी बनाकर उसे तिल के साथ मिलाया जाता है। इसके बाद चाशनी के टुकड़े को कूट-कूट कर तिलकुट तैयार किया जाता है।
 
10 हजार लोग जुड़े हैं तिलकुट के कारोबार से
गया का तिलकुट बिहार के शहरों के अलावा पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों में भेजा जाता है। इस व्यवसाय से गया के करीब दस हजार लोग जुड़े हैं। गया में बना तिलकुट इतना खस्ता और मुलायम होता है कि झटका लगने पर भी चूर-चूर हो जाता है। ताड़ के पत्ते से बने दोना में तिलकुट को पैक किया जाता है। फिर उसे बांस से बनी डलिया में रखकर लोग अपने घर ले जाते हैं।
 
 
 
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