डाउन सिंड्रोम: न माता-पिता की गलती, न कोई बीमारी…

अगर आपके भी बच्चों के चेहरे पर चटपटापन या आंखों का ऊपर की ओर झुकाव होने के साथ मांसपेशियों में कमजोरी की समस्या है, तो हो सकता है डाउन सिंड्रोम। जी हां, डाक्टरों ने बताया कि इसके अलावा बच्चों में मानसिक और शारीरिक विकास में देरी के अलावा किसी चीज को सीखने या समझने में परेशानी भी लक्षण हो सकते हैं।
जन्मजात हृदय दोष, सुनने की समस्या, थायरॉइड रोग और नींद में सांस लेने में रुकावट भी हो सकती है। यह स्थिति जीवनभर रहती है, लेकिन थेरेपी और सही देखभाल से प्रभावित व्यक्ति बेहतर जीवन जी सकते हैं।
क्यों डॉक्टर्स इसे ‘बीमारी’ मानने से कर रहे हैं इनकार?
विशेषज्ञों का मानना है कि हर बच्चे में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए समय पर पहचान और थेरेपी बहुत जरूरी होती है। डाक्टरों ने बताया कि डाउन सिंड्रोम कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक जेनेटिक कंडीशन है। यह एक यादृच्छिक आनुवंशिक त्रुटि है, न कि माता-पिता की किसी गलती के कारण।
इसमें बच्चे में क्रोमोसोम 21 की एक एक्स्ट्रा कॉपी होती है। आमतौर पर इंसानों में 46 क्रोमोसोम होते हैं, लेकिन इन बच्चों में 47 होते हैं। इससे उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ता है। सही देखभाल, थेरेपी और शिक्षा के साथ ये बच्चे भी एक संतुलित और खुशहाल जीवन जी सकते हैं, लेकिन जागरूकता की कमी और सामाजिक धारणा बड़ी चुनौती बनी है।
क्या इसे जड़ से खत्म करना मुमकिन है?
डाक्टरों ने बताया कि डाउन सिंड्रोम की समस्या से बचाव किए जा सकते हैं, लेकिन जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह आनुवांशिक होने के कारण इसका असर बना ही रहता है। यह लगभग हर 700 में से किसी एक बच्चे में पाया जाता है । समय पर पहचान होने से बच्चे के स्वास्थ्य और विकास पर बेहतर ध्यान दिया जा सकता है।
इस तरह जन्म से पहले लगा सकते हैं पता
डाक्टरों ने बताया कि डाउन सिंड्रोम का पता जन्म के समय या गर्भावस्था के दौरान स्क्रीनिंग टेस्ट से लगाया जा सकता है। फर्स्ट ट्राइमेस्टर स्क्रीनिंग, न्यूकल ट्रांसलूसेंसी (एनटी) अल्ट्रासाउंड, नान – इनवेसिव प्रीनेटल टेस्ट (एनआइपीटी) व एम्नियोसेंटेसिस और सीवीएस जांच कराने से अभिभावकों को जानकारी मिल सकती और वे सही मेडिकल काउंसलिंग और देखभाल की योजना बना सकते हैं।
अवेयरनेस बढ़ने और बेहतर डायग्नोसिस के कारण अब ज्यादा केस पहचान में आ रहे हैं। समय से पहचान और उपचार ही समाधान है।
-डॉ. संजू यादव, बालरोग विभाग जिम्स
माताओं की बढ़ती उम्र भी एक जोखिम कारक बन रहा है। इससे मामलों में कहीं न कहीं बढ़ोतरी देखी जा रही है। पुरुष और महिला दोनों वर्ग में लगभग बराबर मामले मिल रहे हैं।
-डॉ. स्वाति छाबरा, हेड पीडियाट्रिक यथार्थ हास्पिटल, ग्रेटर नोएडा वेस्ट





