जाति प्रमाण पत्र फर्जी होने पर अब हाथ से जाएगी डिग्री और नौकरी दोनों…

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी नौकरी या शिक्षण संस्थान में प्रवेश पाया है तो वह वैध नहीं होगा। जाति प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने पर नौकरी व दाखिला समाप्त हो जाएगा। नौकरी की लंबी अवधि के आधार पर नौकरी नहीं बनी रहने दी जा सकती।
मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर, न्यायमूर्ति एनवी रमना व जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने बांबे हाई कोर्ट की पूर्णपीठ के फैसले को निरस्त करते हुए यह व्यवस्था दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला बने रहने लायक नहीं है, इसलिए खारिज किया जाता है। बांबे हाई कोर्ट ने जाति प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के बावजूद लोगों को लंबी अवधि जैसे 10- 12 वर्ष तक नौकरी करने के आधार पर नौकरी में बने रहने की इजाजत दे दी थी। महाराष्ट्र में एक बड़ा वर्ग है, जो हाईकोर्ट के फैसले का लाभ ले रहा था। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में बहुत सी याचिकाएं दाखिल हुई थीं, जिसमें महाराष्ट्र सरकार ने भी एक याचिका दाखिल की थी।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं का निपटारा करते हुए 104 पृष्ठों के अपने फैसले में यह व्यवस्था दी है। पीठ की ओर जस्टिस चंद्रचूड़ ने फैसला लिखते हुए कहा कि सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्ग के उत्थान के लिए संविधान में दिए गए आरक्षण के प्रावधान को उस वर्ग से ताल्लुक न रखने वालों द्वारा फर्जी वाड़ा करके लाभ ले लिए जाना संविधान के साथ धोखाधड़ी है।
कोर्ट ने कहा कि उस वर्ग यानी एससी-एसटी या पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक न रखने के बावजूद फर्जी जाति प्रमाण के आधार पर नौकरी या दाखिला हासिल करने वाला व्यक्ति उन लोगों का हिस्सा मारता है, जिनके लिए वे पद और सीटें थीं। ऐसी गलत नियुक्तियों या दाखिले को लंबे समय तक नौकरी में रहने के आधार पर नहीं बने रहने दिया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाणपत्र के फर्जी पाए जाने पर उसके आधार पर हासिल की गई नौकरी या दाखिला परिणाम स्वरूप अवैध हो जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी नौकरी या शिक्षण संस्थान में प्रवेश पाया है तो वह वैध नहीं होगा। जाति प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने पर नौकरी व दाखिला समाप्त हो जाएगा। नौकरी की लंबी अवधि के आधार पर नौकरी नहीं बनी रहने दी जा सकती। मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर, न्यायमूर्ति एनवी रमना व जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने बांबे हाई कोर्ट की पूर्णपीठ के फैसले को निरस्त करते हुए यह व्यवस्था दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला बने रहने लायक नहीं है, इसलिए खारिज किया जाता है।
बांबे हाई कोर्ट ने जाति प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के बावजूद लोगों को लंबी अवधि जैसे 10- 12 वर्ष तक नौकरी करने के आधार पर नौकरी में बने रहने की इजाजत दे दी थी। महाराष्ट्र में एक बड़ा वर्ग है, जो हाईकोर्ट के फैसले का लाभ ले रहा था। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में बहुत सी याचिकाएं दाखिल हुई थीं, जिसमें महाराष्ट्र सरकार ने भी एक याचिका दाखिल की थी।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं का निपटारा करते हुए 104 पृष्ठों के अपने फैसले में यह व्यवस्था दी है। पीठ की ओर जस्टिस चंद्रचूड़ ने फैसला लिखते हुए कहा कि सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्ग के उत्थान के लिए संविधान में दिए गए आरक्षण के प्रावधान को उस वर्ग से ताल्लुक न रखने वालों द्वारा फर्जी वाड़ा करके लाभ ले लिए जाना संविधान के साथ धोखाधड़ी है।
कोर्ट ने कहा कि उस वर्ग यानी एससी-एसटी या पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक न रखने के बावजूद फर्जी जाति प्रमाण के आधार पर नौकरी या दाखिला हासिल करने वाला व्यक्ति उन लोगों का हिस्सा मारता है, जिनके लिए वे पद और सीटें थीं। ऐसी गलत नियुक्तियों या दाखिले को लंबे समय तक नौकरी में रहने के आधार पर नहीं बने रहने दिया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाणपत्र के फर्जी पाए जाने पर उसके आधार पर हासिल की गई नौकरी या दाखिला परिणाम स्वरूप अवैध हो जाएगा।





