क्यों फोन पर बात करने से ज्यादा टेक्स्टिंग पसंद करते हैं टीनएजर्स?

आज के दौर में अगर आप किसी टीनएजर को अचानक कॉल कर दें, तो शायद वह आपका कॉल काट दे, लेकिन वही टीनएजर घंटों तक वॉट्सऐप या इंस्टाग्राम पर मैसेज कर सकता है। क्या आपने कभी सोचा है कि आवाज के बजाय शब्दों का यह खेल उन्हें इतना क्यों लुभाता है? इसके पीछे सिर्फ आदत नहीं, बल्कि गहरा मनोविज्ञान छिपा है। आइए, 4 पॉइंट्स की मदद से समझते हैं।
सोचने और सुधरने का मौका
फोन कॉल ‘रियल-टाइम’ होती है। वहां आपको तुरंत जवाब देना पड़ता है। टीनएजर्स के लिए यह दबाव जैसा महसूस होता है। इसके उलट, टेक्स्टिंग में उन्हें सोचने का समय मिलता है। वे अपना मैसेज टाइप करते हैं, उसे पढ़ते हैं, गलत होने पर डिलीट करते हैं और फिर सबसे सटीक शब्द चुनकर भेजते हैं। यह उन्हें सेफ फील कराता है।
‘कंट्रोल’ की फीलिंग
टेक्स्टिंग युवाओं को बातचीत पर पूरा कंट्रोल देती है। वे जब चाहें जवाब दें और जब चाहें बातचीत बंद कर दें। कॉल पर बात खत्म करना कभी-कभी अजीब हो सकता है, लेकिन मैसेज में एक ‘इमोजी’ भेजकर बातचीत को खूबसूरती से विराम दिया जा सकता है।
मल्टीटास्किंग की आजादी
आज की पीढ़ी एक साथ कई काम करने की शौकीन है। कॉल पर बात करते समय आपको अपना पूरा ध्यान एक ही व्यक्ति पर देना पड़ता है, लेकिन टेक्स्टिंग करते हुए वे गाना सुन सकते हैं, होमवर्क कर सकते हैं या नेटफ्लिक्स देख सकते हैं। यह उनकी लाइफस्टाइल में पूरी तरह फिट बैठता है।
फोन कॉल का डर
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि कई टीनएजर्स ‘फोन एंग्जायटी’ का सामना करते हैं। उन्हें डर होता है कि वे कॉल पर कुछ गलत न बोल दें या सामने वाले की बात का तुरंत जवाब न दे पाएं। टेक्स्टिंग इस डर को खत्म कर देती है और उन्हें अपनी बात कहने का एक ‘कम्फर्ट जोन’ देती है।
टेक्स्टिंग सिर्फ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह अपनी भावनाओं को सलीके से पेश करने का एक तरीका बन गया है। हालांकि, असली मानवीय जुड़ाव आवाज और चेहरे के हाव-भाव से ही आता है, जिसे इमोजी कभी पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर सकते।





