कारगिल के युद्ध में दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने वाले हमारे वीरों की अद्भूत कहानी….

कारगिल विजय के नायकों की कहानी आज सी रगों में जोश व जुनून भर देती है। विषम परिस्थितियों में दुश्मनों के ढ़ेर करने वाले जाबांजों में शामिल थे राेहतक के गांव खराबड़ के कैप्टन प्रताप सिंह मलिक। इस युद्ध के पलों को याद कर आज भी वह जोश से भर जाते हैं। वह बताते हैं कि युद्ध के दौरान हालत मुश्किल भरे थे। भूख लगती थी तो पास रखे भूने चने खा लेते थे और प्यास लगने पर बर्फ की डली मुंह में डाल लेते थे।
दरअसल 2 जून 1999 को कारगिल में दुश्मन के साथ लडऩे के लिए सेना की टुकड़ी के साथ 20 जवानों को बैकअप के लिए भेजा गया था। इस 20 जवानों में कैप्टन प्रताप सिंह मलिक भी शामिल थे। वह 4 जून को दुश्मन द्वारा दागे गए गोले का टुकड़ा सिर में लगने से बुरी तरह जख्मी हो गए थे। देश कारगिल की जंग जीतने में कामयाब हुआ तो प्रताप जिंदगी की जंग जीतने में सफल हो गए। कारगिल विजय दिवस के 20 साल पूरे होने पर रिटायर्ड कैप्टन प्रताप सिंह मलिक ने दैनिक जागरण से लड़ाई के अनुभवों को साझा किया।
कारगिल विजय दिवस पर खरावड़ के कैप्टन प्रताप सिंह ने साझा की शौर्य की कहानी
कैप्टन प्रताप सिंह मलिक ने बताया कि 1978 में बतौर सिपाही 4-जाट रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। पहली पोस्टिंग हिमाचल प्रदेश में हुई। लेकिन बाद में उनको कारगिल सेक्टर के काकसर में भेज दिया। 1999 में कारगिल सेक्टर में वह बतौर हवलदार कार्यरत थे। तभी पता चला कि गश्त पर निकले कैप्टन सौरभ कालिया सहित छह जवानों को 5299 हिल पर घुसपैठियों ने पकड़ लिया।
सिर में लग गया था दुश्मन का गोला, अस्पताल से ठीक होकर सेवा में लौटे तो कारगिल को ही चुना
उनकी तलाश में गए तो फायरिंग हुई। बाद में सभी के शव मिले, जिनके साथ दरिंदगी की गई थी। इससे सेना के जवानों में काफी गुस्सा था। इसके बाद सेना की तरफ से आपरेशन विजय शुरू हुआ। इस आपरेशन में वह खुद भी शामिल थे लेकिन वह बैकअप के लिए गए थे। ऊंची चोटी पर चढऩा किसी खतरे से कम नहीं था, लेकिन अपने जवानों के साथ हुई दरिंदगी का बदला लेने और देश की सीमा की हिफाजत के फर्ज के सामने सब बौना था।
रात को करते थे पहाड़ की चोटी पर चढ़ाई, दिन में दुश्मन की गतिविधियों पर रखते थे नजर
कैप्टन प्रताप सिंह ने बताया कि दुश्मन चोटी पर बैठा था, इसलिए दिन में पहाड़ पर चढ़ाई करना आसान नहीं था। चढ़ाई रात को करते थे, वो भी कठिन रास्तों से ताकि दुश्मन को भनक न लग सके। दिन में तो दुश्मन फायरिंग करता था। दिन में दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी। खाने को कुछ ज्यादा नहीं था, इसलिए बैग में भूने हुए चने थे। भूख लगती तो चने खा लेते थे और प्यास लगती तो वही बर्फ का टुकड़ा मुंह में रख लेते थे। चढ़ाई कठिन थी, इसलिए खाने का सामान ज्यादा ले जाना संभव नहीं था।
दुश्मन का गोला सिर में लगा, कई माह अस्पताल में रहे
कैप्टन प्रताप सिंह ने बताया कि 4 जून को वह चोटी पर पहुंच गए थे। रात का समय था। चोटी पर चढ़ते समय सिर में पसीना आ गया था, जिसके कारण हेलमेट कुछ क्षण के लिए उतार दिया। इसी दौरान दुश्मन की तरफ से गोला दागा गया, जिसका एक टुकड़ा उनके सिर में लगा और वह गंभीर रूप से जख्मी हो गए। जख्मी ही नहीं बल्कि बेहोश हो गए। जवान उनको कारगिल अस्पताल ले गए, वहां से श्रीनगर बेस में भेजा गया।
हालात गंभीर होने के कारण दिल्ली बेस के बाद आरआर दिल्ली रेफर किया गया। कई माह तक उनका इलाज चला। जिंदगी बच गई, जैसे ही उनको होश आया तो कारगिल की जंग जीतने की खुशी की खबर मिली। अस्पताल के बाद घर कुछ समय आराम किया। दोबारा से ड्यूटी ज्वाइन की तो कारगिल सेक्टर को ही चुना। कारगिल की जंग का एक-एक क्षण उनको आज भी याद है।





