आफत: कोई बांध रहा कटीला तार तो कोई मडैया में काट रहा रात

फतेहपुर । जिले में 18 गोशालाएं संचालित होने के बावजूद भी अन्ना मवेशियों के झुंड ने पूरी तरह से उत्पात मचा रखा है। इनकी गतिविधियों से किसान न तो रात को सो पा रहा है और न ही पेट भर खाना खा पा रहा है। रात-दिन फसल की रखवाली में लगा है, फिर भी चूकते ही मवेशी खेत की खड़ी फसल चट कर जाते हैं।
जिले के सभी 13 विकास खण्डों में किसानों की अन्ना मवेशियों के चलते नींद हराम है। सूबे की योगी सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं में एक “गो संरक्षण” के लिए संचालित गोशालाएं प्रशासनिक उदासीनता के कारण किसानों के सार्थक साबित नहीं हो रही हैं। विजयीपुर क्षेत्र के पहाड़पुर, गुरुवल, रायपुर भसरौल, अंजना भैरव, लोधौरा बहेरा, गोदौरा, रारी, सरौली, गढा, एकडला समेत सभी गांव में सैकड़ों की संख्या में अन्ना मवेशियों का झुंड घूम रहा है जो किसानों की पलक झपकते ही फसल चट कर जाते हैं जिससे परेशान किसान फसल बचाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे है।
अधिकतर किसानों ने तो अपने खेतों में बांस-बल्ली लगाकर कटीला तार लगा दिया है। कुछ गरीब तबके के किसानों ने अपने खेतो में चार बल्लिया लगाकर चारपाई को ऊपर रखकर मडैया बना ली है। जंगली जानवरों एवं जहरीले कीड़ों-मकोड़ों की पूर्ण सुरक्षा कर रात में जाग-जाग कर अन्ना मवेशियों से फसल की रखवाली कर रहे हैं।
यमुना तटवर्ती क्षेत्र में अभी भी बाजरा, ज्वार, तिली, अरहर की फसल लहलहा रही हैं। अन्ना जानवरों से इनकी रखवाली के लिए किसानों की नींद हराम है। रात-दिन की कड़ी मेहनत के बाद भी अवारा जानवरों से फसल बचाना किसानों की चुनौती बना है। गोशालाओं के संचालन के बाद भी प्रशासनिक अधिकारी किसानों को इस समस्या से निजात दिलाने पाने में सार्थक साबित नहीं हो रहे हैं। विजयीपुर ब्लाक में लाखों की लागत से बनी क्षेत्र की इकलौती गौशाला अंजना भैरव में महज एक दर्जन ही गोवंश है जहां पर अंजना भैरव गांव के आसपास ही सैकड़ों जानवरों का झुंड घूम रहा है जब गौशाला वाले गांव के किसानों के खेत सुरक्षित नहीं है तो अन्य गांव के बदहाली का अंदाजा सहजता से लगा सकते हैं।
क्या कहते हैं किसान
विजयीपुर के क्षेत्रीय किसान राजेश दीक्षित कहते हैं पूरे इलाका में हजारों की तादाद में अन्ना मवेशी घूम रहे हैं जिनके लिए प्रशासन ने आज तक कोई व्यवस्था नहीं की है। किसानों की आय दोगुना करने का सपना देख रहे थे, लेकिन यहां तो किसानों की आय आधी भी नहीं बची है। क्षेत्र में महज एक गौशाला का निर्माण हुआ है जिसमें भी महज एक दर्जन अन्ना मवेशी हैं। किसान सैकड़ों के झुंड को दौड़ाकर गौशाला तक ले जाते हैं, जिन्हें फिर बाहर कर दिया जाता है। ऐसे गौशाला निर्माण से क्या फायदा जिसमें गांव के ही जानवरों को ना रखा जा सके?
इस इलाके के दूसरे क्षेत्रीय किसान रामेश्वर निषाद कहते हैं कि फसल की बुआई होते ही किसान अपना विस्तर और चारपाई लेकर खेत पहुंच जाते हैं, जहां महीनों बीत जाते हैं। अन्ना जानवरों के भय से वह गांव नहीं आते हैं। रात-दिन फसल की रखवाली करते हैं, तब जाकर फसल सुरक्षित बचती हैं।
अमौली ब्लाक के नोनारा गांव के रहने वाले किसान मुनीश उत्तम कहते हैं कि क्षेत्रीय गोशाला में अन्ना जानवरों को घेर कर लें जाओ तो वहां से भगा दिया जाता है। गोशाला में तैनात लोग कहते हैं कि व्यवस्था के अनुसार गोवंश हैं, इससे अधिक हम नहीं रख सकते। इस गोशाला की क्षमता सौ से अधिक की नहीं है, जबकि अन्ना मवेशियों की संख्या कई सैकड़ा है।
इसी तरह बुढ़वां गांव के किसान पन्थू सिंह सचान कहते हैं कि अन्ना जानवरों से फसल को सुरक्षित रखना किसी युद्ध की चुनौती से कम नहीं है। क्षेत्र में हजारों की तादाद में मवेशियों के झुण्ड घूम रहे हैं जो मौका पाते ही फसल पर टूट पड़ते हैं। गोशाला सार्थक साबित नहीं हो रही हैं। उनका कहना है कि सुना है बुढ़वा गांव में चार सौ क्षमता की गोशाला को मंजूरी मिल गई है, लेकिन जब बन कर तैयार हो जाये तो समझ में आये। अभी तो घर भूल कर केवल खेतों की रखवाली ही याद रहती है।





