आखिर राहु-केतु को ग्रह क्यों माना जाता हैं, कोई भी इन रहस्यमयी तथ्यो को नही जानता होगा…

भारत देश मे बहुत से ऐसे लोग हैं जोकि ज्योतिषशास्त्र में विश्वास रखते हैं, और सिर्फ़ भारत ही नही बल्कि विदेशी लोग भी आजकल ज्योतिषशास्त्र की तरफ रुख कर रहे हैं। ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान हर किसी को नही होता हैं इसके लिए आपको पुरी एक पढ़ाई करनी पड़ती हैं। जब भी कोई व्यक्ति कोई नया कार्य या कहीं जा रहा होता हैं तो वह सर्वप्रथम अपने ज्योतिष से जाकर उस कार्य को करने का सबसे शुभ समय व विधि पूछता हैं तभी वह उस कार्य को अंजाम देता हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार 9 ग्रह होते हैं जिसमे से दो ग्रह छाया वाले ग्रह होते जिनका नाम राहु केतु हैं। ज्योतिष सबकुछ इन्ही ग्रहों की दिशा व दशा देखकही बताते हैं। वह इस कार्य को कैसे करते ये तो सिर्फ कोई ज्योतिषशास्त्र का ज्ञाता ही बता सकता हैं।

राहु केतु से जुड़े कुछ तथ्य

राहु केतु कुछ विशेष प्रकार के ग्रह हैं। राहु-केतु, सूर्य, चन्द्र और मंगल जैसे ग्रहों की तरह धरातल वाले ग्रह नहीं हैं। यही वजह है कि इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है।
हरि भक्त प्रहलाद के पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप की एक बहन थी जिसका विवाह दैत्य विप्रचित से हुआ था, विवाह के बाद उन्हें सौ सन्तान हुई थी और सबसे बड़े पुत्र का नाम राहु था।

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जब समुद्र मंथन हो रहा था तब राहु ने भी उसमे हिस्सा असुरों की तरफ से लिया था, और देवो के बीच मे चुपके से जाके उसने भी अम्रत का सेवन कर लिया था लेकिन सूर्य और चन्द्र ने उसे पहचान लिया तभी विष्णु भगवान ने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया लेकिन अमर होने की वजह से वह ज़िंदा रहा।

जब अम्रत का सेवन करने के

जब अम्रत का सेवन करने के बाद उसने आतंक मचाना शुरू कर दिया तब बाकी भगवान डर गए और हल पाने के लिए उन्होंने भगवान शिव का सहारा लिया। शिवजी ने श्रेष्ठ चंडिका को मातृकाओं के साथ भेजा। देवताओं ने राहु के सिर को रोके रखा लेकिन अमर होने की वजह से राहु का धड़ अकेले ही मातृकाओं से युद्ध करता रहा।

राहु को परास्त कर पाना असंभव सा लग रहा था, लेकिन उसके सिर ने ही बता दिया कि सर फाड़ के अम्रत निकाल लो और राहु का सर्वनाश हो जाएगा। फिर ऐसा ही किया गया और राहु का किस्सा समाप्त कर दिया गया, तभी से देवताओं ने उसे ग्रह का दर्जा दे दिया।

राहु के ग्रह बनने के बाद

राहु के ग्रह बनने के बाद भी उसने चाँद व सूर्य को माफ नही किया। इसी का नतीजा हैं कि आज भी पूर्णिमा और अमावस्या पर राहु सूर्य और चन्द्र को ग्रसता है। जिनको हम सूर्य ग्रहण या चन्र्द ग्रहण कहते हैं।

ज्योतिष सभी ग्रहों को एक नज़र से व एक समान मानते हैं। पराशर ऋषि ने राहु को अंधकार बढ़ाने वाले ग्रह की संज्ञा दी है। राहु केतु के प्रकोप से हमें दूर ही रहना चाहिए।

राहु केतु को किसी खास

राहु केतु को किसी खास वजह से राशियों का स्वामी नही बनाया गया हैं लेकिन राहू मिथुन राशि में उच्च तथा मीन राशि में नीच का होता है।

 

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